बस्तर के जंगलों में कभी गोलियों की गूंज और बारूद की गंध के बीच जीवन बिताने वाले सरेंडर नक्सलियों के लिए इस साल की होली बेहद खास रही। हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे युवाओं ने इस बार पहली बार खुलकर होली का पर्व मनाया। कांकेर जिले के भानुप्रतापुर स्थित मुल्ला चौगेल पुनर्वास केंद्र में रंग, गुलाल और ढोल की थाप के बीच सरेंडर नक्सली अपनों के साथ खुशियां बांटते नजर आए। कभी जिन हाथों में एके-47 और आईईडी हुआ करते थे, उन्हीं हाथों में इस बार गुलाल और पिचकारी नजर आई। सरेंडर नक्सलियों ने रंग-अबीर उड़ाते हुए एक-दूसरे को गले लगाया और नई जिंदगी की शुरुआत का जश्न मनाया। इसके साथ ही उन्होंने पुलिसकर्मियों को भी रंग लगाया। इस दौरान सरेंडर नक्सली जमकर डांस करते नजर आए। देखिए होली सेलिब्रेशन के ये तस्वीरें- पुनर्वास केंद्र में हैं 40 सरेंडर नक्सली दरअसल, मुल्ला चौगेल पुनर्वास केंद्र में टोटल 40 सरेंडर नक्सली हैं। कौशल प्रशिक्षण (सिलाई, ड्राइविंग, मैकेनिक कार्य) दिया जा रहा है, ताकि वे नई जिंदगी शुरू कर सकें। बुधवार को प्रदेश समेत देशभर में होली सेलिब्रेट किया गया। लेकिन मुल्ला चौगेल पुनर्वास केंद्र में अलग ही माहौल देखने को मिला। यहां सरेंडर नक्सलियों ने पहली बार होली मनाया। सालों तक जंगलों में डर और दबाव के बीच जीवन बिताने नक्सलियों ने एक दूसरे को रंग-गुलाल लगाते हुए समाज में लौटने की खुशी जाहिर की। प्रशासनिक अधिकारी को भी दीं शुभकामनाएं इस मौके पर प्रशासनिक अधिकारी भी पुनर्वास केंद्र पहुंचे और मुख्यधारा में लौटे युवाओं को होली की शुभकामनाएं दीं। अधिकारियों ने कहा कि शासन की पुनर्वास नीति का उद्देश्य भटके हुए युवाओं को समाज में सम्मानपूर्वक पुनर्स्थापित करना है, ताकि वे आत्मनिर्भर बनकर सामान्य जीवन जी सकें। साथियों ने मुख्यधारा में लौटने की अपील मुख्यधारा में लौटीं महिला नक्सली सरदूल नरेटी ने अपना अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा कि मैं 17-18 साल नक्सली संगठन में रही। लेकिन इस साल पहली बार मैंने होली मनाई है। इसके अवाला उन्होंने अपने साथियों से मुख्यधारा में लौटने की अपील की। आत्मसमर्पित नक्सलियों को कौशल प्रशिक्षण दिया जा रहा बता दें कि छत्तीसगढ़ सरकार ‘नक्सलवादी आत्मसमर्पण/पीड़ित राहत पुनर्वास नीति-2025’ के तहत आत्मसमर्पित नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए पुनर्वास केंद्र और ट्रांजिट कैंपों का उपयोग कर रही है। नारायणपुर, कांकेर जैसे जिलों में आत्मसमर्पित नक्सलियों को कौशल प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे 120 दिनों में नई जिंदगी शुरू कर सकें। ……………………… इससे संबंधित यह खबर भी पढ़िए… बच्चों को भड़काते, गुस्सा पैदा कर अपने साथ जोड़ते थे: जिस कॉलेज पर हमला किया, वहां भविष्य बना रहे सरेंडर-नक्सली; सिलाई-ड्राइविंग, मैकेनिक वर्क सीख रहे छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले का लाइवलीहुड कॉलेज। अब यह एक सामान्य कॉलेज नहीं है। चारों तरफ फोर्स का घेरा है। बिना पुलिस की अनुमति के कोई अंदर नहीं जा सकता। क्योंकि यहां 110 आत्मसमर्पित नक्सली रहते हैं। इसे नक्सलियों का पुनर्वास केंद्र बनाया गया है। पढ़ें पूरी खबर…
बस्तर में मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों ने अपनी पहली होली कांकेर जिले के भानुप्रतापुर स्थित मुल्ला चौगेल पुनर्वास केंद्र में मनाई। शासन की पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर आत्मसमर्पण करने वाले इन युवाओं के लिए यह होली खास रही। कभी जिन हाथों में एके-47 और आईईडी होते थे, उन्हीं हाथों में इस बार गुलाल और पिचकारी थी। पुनर्वास केंद्र परिसर में पूर्व नक्सलियों ने रंग, अबीर और ढोल की थाप पर खुलकर होली खेली। उन्होंने एक-दूसरे को रंग लगाकर नई शुरुआत का संदेश दिया। वर्षों बाद वे बिना किसी भय या दबाव के खुले माहौल में अपने परिवार और साथियों के साथ त्योहार मना सके। यह उनके लिए हिंसा का रास्ता छोड़ शांतिपूर्ण जीवन अपनाने का प्रतीक था। इस अवसर पर प्रशासनिक अधिकारियों ने भी केंद्र का दौरा किया और सभी को होली की शुभकामनाएं दीं। अधिकारियों ने मुख्यधारा में लौटे युवाओं का उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि सरकार का उद्देश्य भटके हुए युवाओं को समाज में सम्मानपूर्वक पुनर्स्थापित करना है, ताकि वे आत्मनिर्भर बनकर सामान्य जीवन जी सकें। बस्तर के बदलते परिदृश्य में हिंसा से शांति की ओर बढ़ते इन कदमों को एक सकारात्मक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। बस्तर संभाग में लगातार हो रहे आत्मसमर्पण और पुनर्वास की पहल से उम्मीद है कि आने वाले समय में और भी युवा मुख्यधारा से जुड़ेंगे और विकास की प्रक्रिया में भागीदार बनेंगे।


