रांची के डिप्टी मेयर के लिए 19 मार्च को चुनाव होगा। उसी दिन मेयर और पार्षदों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई जाएगी। इसके बाद डिप्टी मेयर के लिए नामांकन होगा। गोपनीय मतदान से डिप्टी मेयर का चुनाव किया जाएगा। डिप्टी मेयर की कुर्सी पर कब्जा करने के लिए लॉबिंग तेज हो गई है। राजनीतिक पार्टियां भाजपा, कांग्रेस और झामुमो पार्षदों की गोलबंदी में जुट गई हैं। वहीं डिप्टी मेयर के कई दावेदार ऐसे हैं, जो अपने बल-बूते चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। डिप्टी मेयर बनने के लिए भाजपा, कांग्रेस और झामुमो समर्थित पार्षदों की जिस तरह से दावेदारी हो रही है, उससे साफ है कि तीन से चार उम्मीदवार चुनाव लड़ेंगे। झारखंड नगर पालिका अधिनियम के तहत एक से अधिक दावेदार होने की स्थिति में बहुमत के आधार पर फैसला होगा। मतलब जो उम्मीदवार सबसे अधिक वोट लाएगा, वही डिप्टी मेयर की कुर्सी पर काबिज होगा। इसे देखते हुए राजनीतिक दल भी पार्षदों की जोड़-तोड़ में जुट गए हैं। भाजपा जहां संख्या बल बढ़ाने में लगी है, वहीं झामुमो और कांग्रेस जातीय समीकरण बैठाने में लगे हैं। क्योंकि इस बार चुनाव में 19 आदिवासी और 9 मुस्लिम उम्मीदवार जीते हैं। अब संख्या बल जुटाने में सभी दल लगे हुए हैं। पार्षदों की खरीद-फरोख्त की सूचना, प्रशासन अलर्ट डिप्टी मेयर बनने का दावा पेश करने वाले पार्षद कम से कम 25 पार्षदों को अपने पाले में लाने में जुटे हैं। दूसरी ओर संख्या बल की जरूरत को देखते हुए अधिकतर पार्षद चुनाव में हुआ खर्च निकालने का जुगाड़ लगाने में लग गए हैं। क्योंकि चुनाव जीतने वाले पार्षदों ने निर्धारित राशि पांच लाख रुपए से अधिक खर्च किया है। कई ने कर्ज भी लिया है। इससे उनका बजट बिगड़ गया है। ऐसे में डिप्टी मेयर का चुनाव उनके लिए वरदान बन गया है। सूत्रों के मुताबिक कई पार्षदों ने समर्थन के बदले दस लाख रुपए तक की मांग कर दी है। अब मित्रता और परिचय के आधार पर जुगाड़ के साथ लक्ष्मी की माया से ही संख्या बल तय होगा। इधर पार्षदों की खरीद-फरोख्त की संभावना को देखते हुए राज्य निर्वाचन आयोग और पुलिस-प्रशासन भी अलर्ट मोड में है। इसलिए इनकी दावेदारी मजबूत नकुल तिर्की: वार्ड 1 से तीन बार पार्षद रहे। एक बार इनकी पत्नी पार्षद रही हैं। भाजपा से जुड़े हैं। क्षेत्र में अच्छी पकड़ और अनुभव है। लेकिन 25 पार्षदों का जुगाड़ करना चुनौती होगी। सुनील यादव: वार्ड 20 से तीन बार पार्षद बने। एक बार इनकी पत्नी पार्षद रही हैं। अपर बाजार जैसे क्षेत्र में अच्छी पकड़ है। भाजपा से जुड़े हैं। पिछड़े वर्ग से आते हैं, इसलिए दावेदारी कर रहे हैं। आशा देवी: वार्ड 18 से सबसे अधिक पैसा खर्च करने वाले प्रत्याशी सोमवित माजी को पटखनी दी है। तीसरी बार पार्षद बनी हैं। भाई राजेश गुप्ता छोटू कांग्रेस के पुराने और प्रभावशाली नेता हैं। इसलिए कांग्रेस का समर्थन मिल सकता है। मो. एहतेशाम: वार्ड 21 से तीसरी बार पार्षद बने। एक बार इनकी पत्नी पार्षद रही हैं। झामुमो से जुड़े हैं। सभी क्षेत्रों में अच्छी पकड़ है। पार्टी का भी समर्थन है। ऐसे में मजबूत दावेदार हो सकते हैं। मो. असलम: वार्ड 22 से लगातार तीसरी बार पार्षद बने। एक बार इनकी पत्नी पार्षद बनी थीं। रांची में सबसे अधिक 5226 वोट से जीते हैं। शहर की अच्छी समझ है। मो. सलाउद्दीन: वार्ड 17 से चुनाव जीते हैं। इनकी पत्नी भी वार्ड 16 से पार्षद बनी हैं। निगम बोर्ड की बैठकों में जनता के मुद्दों पर मुखर रहे हैं। अल्पसंख्यक कोटे से सबसे अधिक दावेदार डिप्टी मेयर की कुर्सी पर गैर आदिवासी पुरुष पार्षद को बैठाने का समीकरण तैयार किया जा रहा है। क्योंकि मेयर की कुर्सी आदिवासी महिला के पास चली गई है। इसलिए कांग्रेस-झामुमो किसी अल्पसंख्यक पुरुष पार्षद को चुनाव में उतार सकती है। हालांकि कांग्रेस कोटे से महिला पार्षद को डिप्टी मेयर बनाने के लिए भी लॉबी तेज हो गई है। वार्ड 17 से मो. सलाउद्दीन ने मजबूत दावेदारी ठोंकी है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया पर एआई से जनरेट किया हुआ एक फोटो शेयर करते हुए लिखा है— “रांची के होने वाले डिप्टी मेयर।” उन्होंने रांची के सभी नवनिर्वाचित पार्षदों से सहयोग की अपील भी की है। दूसरी ओर वार्ड 22 से मो. असलम संख्या बल जुटाने में लगे हैं। अपने स्तर पर पार्षदों से संपर्क कर समर्थन मांग रहे हैं। चार संभावनाएं… कौन-कैसे जीत सकता है 1. भाजपा के समक्ष गैर समर्थित पार्षदों समेत 11 वोट जुटाने की चुनौती संख्या बल की बात करें तो पिछली बार 53 में से 27 वार्डों में भाजपा समर्थित उम्मीदवार जीते थे, लेकिन इस बार इनकी संख्या 16 रह गई है। मतलब भाजपा के कोटे में 11 पार्षद कम हो गए हैं। इसलिए भाजपा के लिए सीधे तौर पर डिप्टी मेयर की कुर्सी हासिल करना बड़ी चुनौती बन गई है। ऐसे में भाजपा 9 गैर समर्थित पार्षदों को अपने पाले में करने के लिए जोड़-तोड़ कर रही है। 2. कांग्रेस के साथ झामुमो-राजद समर्थित पार्षद आ जाएं दूसरी ओर चुनाव में कांग्रेस से जुड़े सबसे अधिक 18 नेता पार्षद बने हैं। वहीं झामुमो से जुड़े 7 और राजद से जुड़े 3 नेता चुनाव जीतकर आए हैं। इसलिए कांग्रेस-झामुमो मिलकर जातीय समीकरण बैठाने में जुटे हैं, क्योंकि दोनों पार्टियों से समर्थित जीत दर्ज करने वाले पार्षदों में आदिवासी और मुस्लिम की संख्या अधिक है। 3. कांग्रेस-झामुमो दो निर्दलीय पार्षदों को अपने पाले में ले आएं कांग्रेस और झामुमो से जुड़े कुल 25 पार्षद जीतकर आए हैं, यानी सिर्फ दो कम हैं। दो गैर समर्थित पार्षद इनके पाले में आ जाएं तो डिप्टी मेयर पद पर जीत पक्की हो सकती है। 4. झामुमो साथ न भी आए, कांग्रेस-राजद और सभी गैर दलीय पार्षद साथ आ जाएं अगर कांग्रेस के साथ झामुमो न भी आए, लेकिन राजद समर्थित और गैर समर्थित पार्षद कांग्रेस को समर्थन दे दें, तो भी डिप्टी मेयर उनका हो सकता है। हालांकि यह आसान नहीं है।


