सरकार बोली- सामाजिक संतुलन के लिए बिल जरूरी था:डोटासरा ने कहा- दंगे होने पर क्षेत्र अशांत घोषित कर सकेगी सरकार; सत्ता में आए तो बिल रद्द

विधानसभा में शुक्रवार को सबसे चर्चित बिल ‘राजस्थान डिस्टर्ब एरिया बिल 2026’ पास हो गया। सरकार अब दंगा होने पर किसी भी क्षेत्र को अशांत घोषित कर सकेगी। हालांकि इस दौरान विपक्ष ने जमकर हंगामा किया। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि ऐसा बिल लाकर राजस्थान को क्यों जलाना चाहते हैं? समुदाय विशेष को इंगित करना चाहते हैं, आपकी मंशा क्या है? कानून में मंशा स्पष्ट करनी पड़ेगी जो नहीं है। बिल की धारा 5 में जिस तरह के प्रावधान हैं, उससे भ्रष्टाचार के दरवाजे खुल जाएंगे। कोर्ट में भी नहीं जा सकेंगे। डोटासरा ने दावा कि साल 2028 में कांग्रेस सत्ता में आएगी तो हम बिल को खत्म करेंगे। दूसरी ओर, बिल को विपक्ष और निर्दलीय, आरएलडी सहित गैर बीजेपी के 18 विधायकों ने प्रवर समिति को भेजने या जनमत कराने की मांग की। हालांकि सरकार ने कहा कि यह गुजरात माडल की कॉपी नहीं है। यह शांति और सामाजिक संतुलन के लिए है। किसी धर्म को केंद्र बनाकर बिल नहीं ला रहे। कलेक्टर और पुलिस की रिपोर्ट और इनपुट के बाद ही ‘बहुत जरूरी’ होने पर डिस्टर्ब एरिया घोषित करेंगे। दंगों के बाद उस क्षेत्र में संपत्ति का बेचान उचित मूल्य पर हो, इस अधिकार को संरक्षण देने के लिए कानून लाए हैं। कलेक्टर जान सकेंगे कि संपत्ति का विक्रय स्वेच्छा से हो रहा है या दबाव, प्रलोभन, बलपूर्वक या भय से किया जा रहा है। डिस्टर्ब एरिया बिल पास करके प्रदेश को जलाना चाहती है सरकार, कांग्रेस सत्ता में आएगी तो हम बिल को तत्काल खत्म करेंगे -गोविंद डोटासरा, कांग्रेस विधायक कांग्रेस का दावा-यह संपत्ति ही नहीं सामाजिक संतुलन का मुद्दा है इस पर, गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि सरकार बिल के जरिए शांत क्षेत्र को डिस्टर्ब करना चाहती है। बिल के लिए गुजरात से दिल्ली होते हुए पर्ची आई थी। यह हमारे संवैधानिक अधिकारों को चुनौती है। डबल इंजन सरकार कांस्टीट्यूशन अधिकारों को खत्म करने की कोशिश कर रही है। हम गंगा-जमुनी तहजीब से रहते हैं। सरकार धार्मिक उन्माद फैलाकर बहुसंख्यक वोटों के लिए ऐसा कर रही है। यह गुजरात मॉडल है। जमीन जायदाद पर सरकार की नजर है। रही बात संपत्ति खरीदने और बेचने की तो यह अधिकार संविधान ने हमें दिए हैं। इस पर सरकार का नियंत्रण करना यानी कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए शांत क्षेत्र को अशांत करने का षड्यंत्र है। मंत्री बोले- क्षेत्र में धर्म विशेष का क्लस्टर रोकने को लाया गया बिल संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने कहा कि हम तो ‘तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहे ना रहे’ की भावना में विश्वास करते हैं। हमारी ऐसी मंशा नहीं है कि राज के लिए दंगे भड़काएं। ऐसे में विपक्ष के सांप्रदायिक वर्गीकरण, आर्थिक वर्गीकरण वाले बिल के आरोप निराधार हैं। हम नहीं चाहते कि जाति, धर्म विशेष का क्लस्टर बने या फिर दूसरे धर्म के लोग पलायन को मजबूर हों। राजस्थान की परिस्थितियों और विधि विशेषज्ञों की राय के बाद बिल बना है। किसी धर्म संप्रदाय का उल्लेख नहीं है। तनाव, सांप्रदायिक अशांति में यह कानून लागू होगा। देखा गया है कि दंगे के बाद लोग भय से अपनी संपत्ति कम दामों पर बेच कर चले जाते हैं। ऑपरेशन सिंदूर में 22 जिलों से 132 पशुपालन अफसर-कर्मचारी पदस्थापित हुए थे सीमावर्ती जिलों में भेजे गए पशुपालन कर्मचारियों को पुराने स्थानों पर भेजा, कुछ की ​वापसी का मामला कोर्ट में : मंत्री डोटासरा ने पशुपालन विभाग में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया। इस पर पशुपालन मंत्री जोराराम कुमावत ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर में जिन कर्मचारियों को बॉर्डर पर भेजा गया था, उनमें से कुछ बुला लिए गए हैं। कुछ को कोर्ट के आदेश के अनुसार लगाया जा रहा है। इस पर डोटासरा ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर में सीमावर्ती जिलों में भेजे कर्मचारियों के तबादलों के मामले में विभागीय स्तर पर आदेशों की अवहेलना की गई है। बीकानेर, श्रीगंगानगर, जैसलमेर और बाड़मेर की पशु चिकित्सा संस्थाओं में 22 जिलों से 39 चिकित्सकों और 93 कर्मचारियों को इन जिलों में पदस्थापित किया था। डोटासरा ने सीकर के एक अधिकारी दीपक अग्रवाल का नाम लेकर कहा कि वह वहां भ्रष्टाचार कर रहा था, उसी ने चुनिंदा कर्मचारियों को जो दीपक के राडार पर नहीं आ रहे थे, उन्हें बॉर्डर पर भेजने के लिए लिस्ट में नाम लिखा दिए। बाद में वह एसीबी में रंगे हाथों पकड़ा भी गया, लेकिन विभाग के सचिव ने उसे निलंबन काल में अपने पास ही लगा लिया। दोनों एक-दूसरे की दोस्ती निभाने के कारण मंत्री और सरकार की नहीं सुन रहे। आरोप लगाया कि एक अधिकारी इतना प्रभावशाली हो गया कि वह मंत्री और सरकार के निर्देशों को भी रोकने की स्थिति में है। भ्रष्टाचार के आरोपों में पकड़े गए अधिकारी को निलंबित करने के बाद भी जयपुर निदेशालय में ही लगा दिया गया, जिससे उसे लाभ मिलता रहे। डोटासरा ने इसे गंभीर प्रशासनिक समस्या बताते हुए कहा कि यदि कोई अधिकारी सरकार और मंत्री के आदेशों के ऊपर बैठकर फैसलों को रोक सकता है, तो यह पूरे प्रशासनिक तंत्र के लिए चिंताजनक स्थिति है। उन्होंने सरकार से मांग की कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। डोटासरा ने विभागीय सचिव पर मंत्री के निर्देशों भी नहीं मानने के आरोप लगाए। मंत्री के इस आदेश पर कि कर्मचारियों को दोबारा अपने स्थान पर लगा दिया जाए…सचिव ने लिख दिया कि नॉट जस्टीफाइड। कई कर्मचारी आज भी अदालतों के आदेश लेकर बैठे हैं, लेकिन समीक्षा के नाम पर मामलों को लंबित रखा गया है। इस दिशा में जल्द कार्रवाई होनी चाहिए।

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