भास्कर न्यूज | खरौंधी श्री शतचंडी महायज्ञ के तीसरे दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बीच बाल व्यास सह रामाचार्य जी महाराज ने अपने प्रवचन में भगवान राम के जीवन से जुड़े अत्यंत मार्मिक सीता हरण प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया। प्रवचन सुनने के लिए दूर-दूर से पहुंचे श्रद्धालु भक्तिभाव से कथा का श्रवण करते नजर आए। संत शिरोमणि ने कहा जब भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के दौरान पंचवटी में निवास कर रहे थे। उसी समय लंका के राजा रावण ने छल और कपट का सहारा लेकर माता सीता का हरण कर लिया। रावण ने साधु का वेश धारण कर माता सीता के पास पहुंचा और अवसर पाकर उनका अपहरण कर लिया। संत ने कहा कि रावण अत्यंत बलशाली और विद्वान होने के बावजूद अपने अहंकार और अधर्म के कारण पतन की ओर बढ़ गया था। उन्होंने बताया जब रावण माता सीता को आकाश मार्ग से लंका की ओर ले जा रहा था। तब माता सीता अत्यंत व्याकुल होकर रोने लगीं और चारों ओर से सहायता की पुकार करने लगीं। माता सीता की करुण पुकार सुनकर पक्षियों के राजा गिद्धराज जटायु वहां पहुंचे। जटायु भगवान राम के परम भक्त थे और उन्होंने माता सीता को संकट में देखकर तुरंत रावण का रास्ता रोक लिया। संत शिरोमणि ने बताया कि जटायु ने रावण को समझाने का प्रयास किया और कहा किसी की पत्नी का इस प्रकार हरण करना घोर अधर्म है। लेकिन रावण अपने घमंड में चूर था और उसने जटायु की बात नहीं मानी। इसके बाद जटायु ने माता सीता को मुक्त कराने के लिए रावण से भयंकर युद्ध किया। वृद्ध होने के बावजूद जटायु ने अद्भुत साहस और वीरता का परिचय दिया। उन्होंने रावण के रथ को क्षतिग्रस्त कर दिया और उसे रोकने का पूरा प्रयास किया। लेकिन अंत में दुराचारी रावण ने अपने शक्तिशाली अस्त्र से जटायु के पंख काट दिए। जिससे जटायु गंभीर रूप से घायल होकर धरती पर गिर पड़े। इसके बाद रावण माता सीता को लेकर लंका की ओर चला गया। संत शिरोमणि ने आगे बताया जब भगवान राम और लक्ष्मण माता सीता की खोज करते हुए वन में भटक रहे थे। तब वे घायल अवस्था में पड़े जटायु के पास पहुंचे। भगवान राम ने जब जटायु को उस अवस्था में देखा तो अत्यंत व्यथित हो गए। उन्होंने स्नेहपूर्वक जटायु के शरीर पर हाथ फेरते हुए उनसे पूरी घटना के बारे में पूछा। तब जटायु ने भगवान राम को बताया कि रावण माता सीता का हरण कर लंका की ओर ले गया है।


