घने जंगल, कच्चे रास्ते, नक्सलियों की मौजूदगी और टूटा हुआ अस्पताल, इन हालातों में भी अगर किसी ने हार नहीं मानी तो वह एएनएम विनीता दास हैं। दंतेवाड़ा जिले के नक्सल प्रभावित पोटाली क्षेत्र में वह पिछले 35 वर्षों से लगातार स्वास्थ्य सेवाएं दे रही हैं। साल 2007 में नक्सलियों ने पोटाली का सरकारी अस्पताल तोड़ दिया था। इसके बाद इलाके में प्रसूति और स्वास्थ्य सेवाएं लगभग ठप हो गईं। विनीता दास ने हालात के आगे झुकने के बजाय अपने घर को ही अस्थायी अस्पताल बना दिया और वहीं महिलाओं की डिलीवरी कराना शुरू कर दी। इन 19 सालों में वे अपने मकान में 1000 से ज्यादा डिलीवरी करवा चुकी हैं। आज भी पोटाली गांव की दीवारों पर नक्सली नारे लिखे दिखाई देते हैं, लेकिन इन्हीं दीवारों के बीच विनीता दास का सेवा का सफर जारी है। शेष|पेज 18 सीमित संसाधनों और जोखिम भरे माहौल के बावजूद वह मुलैर, काकड़ी और पोटाली इन तीन गांवों की महिलाओं और बच्चों के लिए जीवनरेखा बनी हुई हैं।
तीन गांवों में आज भी जारी सेवा
विनीता दास आज भी मुलैर, काकड़ी और पोटाली गांवों में नियमित रूप से स्वास्थ्य सेवाएं दे रही हैं। टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं की जांच, प्रसव और प्राथमिक उपचार जैसे काम वह लगातार कर रही हैं। एएनएम के रूप में उन्होंने 1990 में सेवा शुरू की थी और आज तक इसी क्षेत्र में काम कर रही हैं। जहां जाने से लोग डरते हैं, वहां वह पिछले 35 साल से मां और बच्चों की जिंदगी बचा रही हैं। 2005 से 2015 तक रहा सबसे कठिन समय:
विनीता दास बताती हैं कि उनके लिए सबसे कठिन समय 2005 से 2015-16 के बीच का था। उस दौरान सड़कें कट गई थीं और कई गांवों तक पहुंचने के लिए उन्हें 20-20 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। नेटवर्क, बिजली जैसी सुविधाएं नहीं थीं। कई बार चिमनी की रोशनी में ही डिलिवरी करवानी पड़ती थी। अब परिस्थितियां पहले से बेहतर हो गई हैं। विनीता दास का प्रमोशन भी हो चुका है और वह सुपरवाइजर बन गई हैं, लेकिन इसके बावजूद वह आज भी उसी क्षेत्र में सेवा दे रही हैं। रात में जंगल जाने से भी नहीं झिझकीं पिछले तीन दशकों से अधिक समय में विनीता दास ने 1000 से ज्यादा सुरक्षित प्रसव कराए हैं। दूरदराज के इन गांवों में कई बार गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक ले जाना संभव नहीं होता। ऐसे में गांव वाले सबसे पहले विनीता दास को ही याद करते हैं। कई बार उन्हें रात के समय जंगल के रास्तों से होकर मरीजों तक पहुंचना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी सेवा से पीछे हटना नहीं सीखा। गांव में नानो के नाम से पहचान
साहस और समर्पण की वजह से गांव-गांव में लोग उन्हें पहचानते हैं। ग्रामीण उन्हें प्यार से नानो (बहन) कहकर बुलाते हैं। नक्सल प्रभावित इलाके में तीन दशकों से ज्यादा समय तक सेवा देकर उन्होंने साबित किया है कि कठिन परिस्थितियां भी मानवता की राह नहीं रोक सकतीं। स्वास्थ्य सुविधाएं गांव में ही मिले, प्रयास जारी
ग्रामीण क्षेत्र के लोगो को स्वास्थ्य सुविधाएं गांव में ही मिले इसके पूरे प्रयास किए जा रहें है। पोटाली क्षेत्र में विषम परिस्थिति में भी एएनम द्वारा स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाई जाती थीं।
– अजयराम टेके, सीएचएमओ


