महिला दिवस विशेष:कुशलगढ़ की ‘सखी’; पीएचडी की, नौकरी छोड़ी, फिर डॉ. निधि ने 9000 बेटियों को बनाया आत्मनिर्भर, इनमें 80% आदिवासी

अपना भविष्य देखो, क्यों दूसरों के चक्कर में जिंदगी खराब कर रही हो? डॉ. निधि जैन के कानों में आज भी परिवार के ये ताने गूंजते हैं। लेकिन, वे उन 9000 बेटियों की मुस्कान देखती हैं, जिन्हें उन्होंने ‘पलायन, मजदूरी और शोषण’ के दलदल से निकाला है। इसके आगे उन्हें अपना हर त्याग छोटा लगता है। खास यह है कि इनमें 80% आदिवासी बेटियां हैं। डॉ. निधि ने उदयपुर के एमएलएसयू से पीएचडी की। जॉब सहित कई रिसर्च के काम छोड़ दिए। दरअसल, उनके दिमाग में अपने क्षेत्र में लड़कियों के मजदूरी करने, काम के लिए पलायन कर मध्यप्रदेश, गुजरात जाने, फिर शोषण का शिकार होने के दृश्य घूमते थे। इसलिए उन्होंने लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने को ही जीवन का लक्ष्य बना लिया। 2017 में अपने गांव कुशलगढ़ में सखी नाम से प्रोजेक्ट शुरू किया। यहां मुफ्त में सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, मेंहदी लगाने जैसे कई हुनर सिखाने शुरू किए। गांव-गांव जाकर लड़कियों को जोड़ा। डॉ. निधि सबसे अच्छे हुनर वाली लड़कियों को भामाशाहों की मदद से इलेक्ट्रिक सिलाई मशीन भी उपहार में देती हैं, जिसकी कीमत करीब 15 हजार रुपए होती है। वे अब तक 80 मशीनें बांट चुकी हैं। 8 साल में उन्होंने जिन 9000 लड़कियां को सिखाया, वे हर महीने 25-30 हजार रुपए कमा रही हैं। इनमें करीब 3000 तो खुद की दुकान चला रही हैं। इनके हाथों से तैयार साड़ियां और परिधान आज ‘ट्राइब्स इंडिया’ के जरिए देशभर में बिकती हैं। बीए करने के बाद भी मजदूरी करती थी पूजा, अब आईटीआई की टीचर बनी पूजा डामोर बीए करके भी मजदूरी करती थी। शादियों में खाना बनाने जाती। फिर डॉ. निधि से जुड़कर दो साल सिलाई, कढ़ाई सीखी। इसी दौरान निधि से उसके लिए एक अफसर से मदद मांगी तो उन्होंने आईटीआई कॉलेज में टीचन बना दिया। अब वे वहां सिलाई-कढ़ाई सिखाती हैं। सामाजिक विवाद में पति की हत्या हो गई,… लेकिन हुनर के दम पर लड़ रही कविता कविता (बदला नाम) का पति मजदूर था। इसी दौरान वह डॉ. निधि से जुड़ीं। सिलाई-बुनाई सीखी, दुकान खोली और कमाने लग गई। पति ने भी साथ दिया, लेकिन समाज में झगड़ा हुआ तो पति की हत्या कर दी गई, घर भी जला दिया गया। फिर भी कविता ने हार नहीं मानी, वह अभी बाजार में खुद की दुकान चला रही हैं।

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