पोषण सिस्टम बीमार:कहीं टूटे मीटर, कहीं थैले में तौल रहे वजन; प्रदेश का हर चौथा बच्चा बौना

सुकमा जिले में कुपोषण से हर दूसरा बच्चा बौना आंगनबाड़ी में बच्चों की हाइट (ऊंचाई) मापने की मशीन टूटी है। बच्चों का वजन जांचने की मशीन है, लेकिन उसमें बच्चे को बिठाने के लिए पेंटनुमा थैला नहीं है। आंगनबाड़ी में पोषण आहार बनाने के लिए जिन बाल्टी से पानी लाया जाता है, उन्हीं में सुअर पानी पी रहे हैं। यह दृश्य छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित जिले सुकमा की आंगनबाड़ियों में देखने को मिले। जहां 0 से 6 साल की उम्र समूह का हर दूसरा बच्चा बौना है। जबकि प्रदेश में 24% बच्चे बौने हैंं। ये खुलासा केंद्रीय महिला-बाल विकास विभाग की पोषण ट्रेकर रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक बौनापन प्रभावित बताए गए सुकमा जिले की आंगनबाड़ियों की पड़ताल में हुआ है। पड़ताल में ये भी खुलासा हुआ है कि 0-5 साल की उम्र समूह के बौनापन पीड़ित बच्चों की संख्या सुकमा में 9 माह में 2% बढ़ी। जबकि 0-6 वर्ष के उम्र समूह में बौनापन पीड़ितों का आंकड़ा 50% है। ये स्थिति तब है जब महिला-बाल विकास विभाग के अफसर लगातार कुपोषित बच्चों की निगरानी के लिए केंद्र के पोषण ट्रेकर पर रिपोर्ट सबमिट कर रहे हैं। विभाग पोषण अभियान चलाता है। इसके लिए राज्य सरकार ने बीते साल अपने बजट में 125 करोड़ रुपए का प्रावधान किया था। 1 अप्रैल से 31 दिसंबर 2024 के बीच सरकार ने बच्चों में कुपोषण मिटाने 25 करोड़ 40 लाख रुपए खर्च किए हैं। इस दौरान छत्तीसगढ़ में बौनापन पीड़ित बच्चों की संख्या 8 फीसदी घटी है। सितंबर 2024 में प्रदेश में 18 प्रतिशत बच्चे बौनापन पीड़ित बच्चे थे। इनकी संख्या जनवरी 2025 में घटकर 24 हो गई है। जो सितंबर 2024 की तुलना में 6 प्रतिशत ज्यादा है। बौनापन दूर करने के लिए लड़कियों का पोषण जरूरी: कुपोषण को लेकर एम्स रायपुर के शिशुरोग विभाग के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. अतुल जिंदल, शिशुरोग विशेषज्ञ डॉ. प्रशांत केडिया का कहना है कि आदिवासी क्षेत्रों में बौनापन कई दशकों से है। इसके कई कारण हैं। जैसे- सिकलिंग, एनीमिया, मलेरिया और कुपोषण। बौनापन वंशानुगत भी हो सकता है। समस्या के समाधान में लंबा समय लगेगा। पूरा फोकस लड़कियों पर होना चाहिए, जो भविष्य मां बनेंगी। उनके पोषण, टीकाकरण पर ध्यान दिया जाए तो कुछ सालों में रिजल्ट दिखने लगेंगे। एक ही आंगनबाड़ी में मिले दो बौने बच्चे
सुकमा-कोंटा मार्ग का अंदरूनी गांव आरगट्टा की आंगनबाड़ी में बच्चों की नापजोख के सभी उपकरण व्यवस्थित मिले। यहां 2 बच्चे बौने मिले। मांडवी विगनेश की उम्र 4 साल 2 माह व लंबाई 88.5 सेमी है। यहीं मांडवी अम्यूज की उम्र 4 साल एक माह व लंबाई 89 सेमी है। दोनों बच्चे पोषण ट्रेकर के पैरामीटर्स के अनुसार बौने हैं। महिला एवं बाल विकास विभाग की गाइडलाइन के अनुसार दोनों बच्चों की लंबाई 91.6 सेंमी. होना चाहिए थी। आंगनबाड़ी में रिकॉर्ड रजिस्टर में उनकी नापजोख की जानकारी भी पिछले दो महीने से दर्ज नहीं की गई थी। भास्कर लाइव : आंगनबाड़ी के किचन में घूम रहे सुअर और कुत्ते खपरैल में संचालित हो रही बेदरे-1 आंगनबाड़ी गेट पर बच्चों के लिए पोषण आहार बनाया जाता है। यहां जिन बर्तनों से पोषण आहार के लिए पानी लाया जाता है। उन बाल्टियों को सुअर और कुत्ते चाट रहे हैं। वहीं नजदीक में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका के मौजूद हैं। यह दृश्य भास्कर टीम को आंगनबाड़ी के बाहर 17 फरवरी को दोपहर 1 बजे देखने को मिले। टूटे हाइट मीटर से मापी जा रही बौने बच्चों की लंबाई
सभी आंगनबाड़ियों को केंद्र में पंजीकृत बच्चों की लंबाई मापने के लिए करीब 4 फीट की ऊंचाई वाला मीटर दिया है। लेकिन, सुकमा की राजपेंटा आंगनबाड़ी में बच्चों की लंबाई टूटे मीटर से मापी जा रही है। आंगनबाड़ी में तौलकांटा टांगने की जगह नहीं बेदरे-1 आंगनबाड़ी खपरैल में संचालित है। यहां तौलकांटा को स्ट्रक्चर पर लटकाने की व्यवस्था नहीं है। इससे पंजीकृत बच्चों का नियमित वजन नहीं हो पाता है। भास्कर ने वहां लकड़ी पर लगे कांटे पर वजन कराया, तो 0-5 साल उम्र समूह के 2 बच्चे गंभीर बौनापन से पीड़ित मिले। प्रदेश व सुकमा में बच्चों के बौनेपन के कई कारण हैं। पहले की तुलना में अब स्थिति में सुधार है। आंगनबाड़ी शुरू कर रहे हैं। मैं मानती हूं एक बड़ा कारण अशिक्षा भी है। गर्भावस्था के दौरान महिलाएं खान-पान का ध्यान नहीं रखती हैं। -लक्ष्मी राजवाड़े, मंत्री, महिला एवं बाल विकास तथा समाज कल्याण विभाग ^बौनापन पीढ़ी या वंशानुगत समस्या है। विभाग का बौने बच्चों की देख-रेख करने के साथ फोकस उन युवतियों पर है, जो भविष्य में मां बनेंगी। इनकी न्यूट्रीशन काउंसिल और एनिमिया कंट्रोल, दो प्रमुख फोकस एरिया हैं, जिन पर समग्र रूप से काम कर रहे हैं।
शम्मी आबिदी, सचिव, महिला एवं बाल विकास विभाग भास्कर एक्सपर्ट – डॉ. भारती कुलकर्णी, डायरेक्टर, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशन (आईसीएमआर), हैदराबाद 0-2 साल तक के बच्चों में कुपोषण ज्यादा होता है। ऐसा जन्म से 6 माह तक ब्रेस्ड फीड न मिलने से होता है। जन्म के 6 महीने बाद पोषक आहार दिया जाना चाहिए। कई बार महिला मजदूरी करने जाते वक्त बच्चे को दूसरे सदस्यों के पास छोड़ जाती है, जो उसे पाउडर मिल्क, पानी पिलाते हैं। इससे पर्याप्त पोषण नहीं मिलने पर ग्रोथ धीमी हो जाती है। उसके कुपोषित होने से 3-6 साल की उम्र में बौनापन, कम वजन की शिकायत मिलती है।

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