सरकारी नौकरी छोड़ सट्टा खिलाते, कोई कॉन्स्टेबल कोई बीटेक:खेलने वाले कर्ज में डूबे, कोई चोर बन गया तो किसी ने फंदा लगाया

उदयपुर के मावली गांव में 23 जनवरी को कर्ज से परेशान लक्ष्मण रेगर ने फंदा लगाकर सुसाइड कर लिया। पुलिस को सुसाइड नोट मिला, जिस पर लिखा था- ऑनलाइन गेम में सारे पैसे हार गया। कर्ज से परेशान होकर ये कदम उठा रहा हूं। जोधपुर के खुमाराम सुथार की नौकरी छूटी तो उसने ऑनलाइन सट्टा लगाना शुरू किया। रोज हारने लगा तो कर्ज को चुकाने के लिए मकान मालिक के घर 70 लाख रुपए की चोरी कर डाली। पाली में किन्नरों की हवेली इलाके में राकेश सैन की डेड बॉडी फंदे से झूलती मिली। पता चला कि उसने पाकिस्तानी सट्टा ऐप डाउनलोड कर रखा था, जिसमें वो रोज हार रहा था। ये घटनाएं बता रही हैं कि राजस्थान के शहरों में ही नहीं, गांवों में भी ऑनलाइन सट्टे का जाल बिछा है। रातों रात अमीर बनने के लालच में कई युवा इनके जाल में फंसकर क्रिमिनल बन गए हैं। बीते एक साल में सुसाइड इस तरह के मामलों में सुसाइड की 5-6 घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इसके उलट ऑनलाइन सट्टा और गेमिंग ऐप के मास्टरमाइंड करोड़ों-अरबों के मालिक बन बैठे हैं। हाल ही में जयपुर की मानसरोवर पुलिस ने एक ऐसी ही गैंग को पकड़ा है, जिसमें शामिल लोगों ने सट्टा खिलाने के लिए सरकारी नौकरी तक दांव पर लगा दी। इनमें कई पुलिसकर्मी भी शामिल हैं। आज संडे बिग स्टोरी में पढ़िए- कैसे ऑनलाइन गेम्स राजस्थान के युवाओं को बर्बाद कर रहे हैं… सबसे पहले ऑनलाइन गेमिंग ऐप का शिकार हुए पुलिसकर्मी के बेटे की आपबीती से समझते हैं, कैसे ये जाल बुनते हैं…
जयपुर निवासी पुलिसकर्मी ने बताया कि मेरा 22 वर्षीय बेटा विकास मोबाइल पर ऑनलाइन गेम खेलता था। पिछले करीब डेढ़ साल से Rummy, nabob Rummy OLA जैसे गेम खेल रहा था। इसकी जानकारी मुझे नहीं थी। बेटे के मोबाइल में ऑनलाइन पेमेंट के लिए मैंने पत्नी का अकाउंट जोड़ रखा था। जब तक विकास बेटिंग ऐप पर 10-20-50 रुपए लगा रहा था। उसे गेम में जीता हुआ दिखाया जा रहा था। जीती हुई रकम ऐप पर बनाए गए उसके डमी अकाउंट में दिखाई देती थी। धीरे-धीरे उसकी लत और लालच बढ़ता चला गया। बीते साल उसने पत्नी के अकाउंट से 1 लाख रुपए गेमिंग ऐप में ट्रांसफर कर लिए। गेम खेलता रहा। शुरुआत में कुछ मुनाफा होता दिखा, लेकिन धीरे-धीरे हारने लगा। इस डर के मारे उसने 55 हजार रुपए वापस अकाउंट में ले लिए। 45 हजार शेष रह गए थे। जब विकास ने अपने रुपए निकालने चाहे तो शातिर ठगों ने कुछ समय बाद ऐप पर बने अकाउंट को ब्लॉक कर दिया। उन पैसों को निकालने के लिए ठगों ने ऐसी ऐसी शर्तें रखी कि वो उनके जाल में फंसता चला गया। ठगों ने 9 दिसंबर से 13 दिसंबर 2023 तक केवल 5 दिनों में ही करीब ढाई लाख रुपए ठग लिए। इतना ही नहीं, बेटे को गेम में आगे खेलने के लिए लोन तक दिलवा दिया। कुछ दिन बाद लोन रिकवरी के लिए कुछ लोग घर पर आए और 56 हजार रुपए मांगे तब इसका खुलासा हुआ। इस संबंध में आरोपियों के खिलाफ साइबर पुलिस थाने में केस दर्ज कराया। बेटे को समझाया और ऑनलाइन गेम नहीं खेलने को कहा। पुलिस कार्रवाई के बाद ढाई लाख में से एक लाख 10 हजार रुपए वापस मिल गए। अब बेटे ने ऑनलाइन गेम खेलना बंद कर दिया है और वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। विकास जैसे कई बच्चों ने झांसे में आकर लाखों गंवाए, लेकिन अब आपको ऐप चलाने वाले उन मास्टरमाइंड की कहानी पढ़वाते हैं, जो करोड़पति बन गए… ऑनलाइन गेम खेलने वाले और उनके परिवार भले ही बर्बाद हो रहे हों, लेकिन गेमिंग ऐप चलाने वालों को इससे मोटी कमाई हो रही है। हाल ही में जयपुर की मानसरोवर थाना पुलिस ने 24 फरवरी को ऐप के जरिए ऑनलाइन सट्टा और गेम खिलाने वाली गैंग को पकड़ा था। चौंकाने वाली बात यह है कि गैंग से जुड़े कई लोग तो सरकारी नौकरी पर थे। लेकिन मोटी कमाई के चक्कर में अपनी सरकारी नौकरी को भी दांव पर लगा दिया। ऑनलाइन गेमिंग ऐप से इस गैंग ने करोड़ों रुपए की संपत्ति बना ली। बेटिंग ऐप से मिलता था 25 प्रतिशत कमीशन
मानसरोवर थाना इंचार्ज लखन सिंह खटाना ने बताया कि पुलिस टीम ने 24 फरवरी को गैंग के रवि गोदारा, मुकेश मीणा, रोबिन कुमार और महेश पूनिया को ऑनलाइन बेटिंग ऐप से सट्टा खिलाते हुए पकड़ा था। पूछताछ में सामने आया कि ये आपस में दोस्त हैं और पहले खुद ऑनलाइन सट्टा खेलते थे। रवि सीआरपीएफ में काॅन्स्टेबल लग गया। इधर, मुकेश का आरपीएफ में कॉन्स्टेबल के पद पर चयन हो गया। रवि और मुकेश ने 2 साल पहले नौकरी के साथ ही इन ऑनलाइन गेम्स खिलाने की शुरुआत की। मोटी कमाई होने पर दोनों ने नौकरी पर जाना ही छोड़ दिया। दोनों करीब एक साल से अनुपस्थित चल रहे थे। गिरोह ने बेटिंग ऐप को अपने कस्टमर सौंपकर उसकी फ्रेंचाइजी ले ली। सौदे के अनुसार इनकम का 25 प्रतिशत कमीशन इनका होता था। वहीं 75 प्रतिशत कमीशन बेटिंग ऐप को देते थे। गिरोह महादेव बेटिंग नाम के ऐप पर 70 से अधिक गेम्स खिला रहा था। जिनमें गोल्डन रौलेट, मिनी सुपर ओवर, बॉलीवुड कसीनो और 3 पत्ती आईसी जैसे गेम शामिल थे। डिफेंडर-रोवर-वॉल्वो में घूमते थे
पुलिस ने इनके पास से 4 लग्जरी कारें बरामद की हैं। इनमें से एक लग्जरी वॉल्वो कार रोबिन कुमार के नाम रजिस्टर्ड है। वहीं अन्य वाहन जिनमें रोवर, डिफेंडर, रेंज व स्कॉर्पियो शामिल हैं। वो किसी अन्य कंपनी के नाम पर रजिस्टर्ड हैं। पुलिस इन कंपनियों से आरोपियों के कनेक्शन की पड़ताल कर रही है। जांच में सामने आया कि रवि गोदारा की जयपुर के अहिंसा सर्किल पर स्थित एक नाइट क्लब में पार्टनशिप है। आरोपियों ने पिछले साल डेढ़ करोड़ रुपए के फ्लैट खरीदे थे। लबाना गांव में एक फार्म हाउस खरीद रखा है। झुंझुनूं जिले में जमीन खरीदने की जानकारी भी मिली है। भास्कर ने पुलिस, साइबर एक्सपर्ट और पीड़ित परिवार से बातचीत कर इनके लूट करने के तरीके को समझने की कोशिश की… डीसीपी साउथ दिगंत आनंद ने बताया कि मानसरोवर में पकड़े गए शातिर बदमाशों ने ऑनलाइन साइट एमडी पैनल महादेव से ‘ऑल’ नाम की आईडी ले रखी थी। पुलिस ने जांच के लिए जब उसी साइट पर आरोपियों के यूजर आईडी व पासवर्ड डाले तो लॉगिन नहीं हुआ। इस पर आरोपियों ने बताया कि ये ऑनलाइन साइट वीपीएन से चलाते हैं। मामूली सी छेड़छाड़ होने पर इसे ऑनलाइन ही बंद कर देते हैं। इस कारण अब यह लॉगिन नहीं होगी। इस पैनल की मास्टर आईडी-पासवर्ड मुकेश व महेश पुनिया के पास थी। महेश कस्टमर की आईडी बनाकर ग्राहकों को देता था। फिर पैसा ट्रांसफर करने के लिए किराए के बैंक अकाउंट ऐड करता था। ऑनलाइन बेटिंग ऐप पर आरोपी लोगों को जीतने का लालच देकर पैसे लगवाते थे। जब वे ज्यादा रुपए लगाते थे तो उन्हें हराकर किराए के बैंक अकाउंट से पैसा अपने अकाउंट में ट्रांसफर कर लेते। ठगों के पास रहता है पूरा कंट्रोल
साइबर एक्सपर्ट सोनाली गुहा ने बताया कि ऑनलाइन सट्टा ऐप के सॉफ्टवेयर की प्रोग्रामिंग इस तरह तैयार की जाती है कि उसका पूरा कंट्रोल शातिर ठगों के पास ही होता है। उनकी टेक्निकल टीम पूरा कंट्रोल रखती है। ऐप को बनाते समय उसकी कोडिंग इस तरह की जाती है कि एक निर्धारित संख्या से अधिक खेलने या एक निश्चित राशि से अधिक रुपए लगाने पर उस व्यक्ति को हरा दिया जाता है। यानी शुरुआत में कुछ गेम जिताए जाते हैं। लालच बढ़ने पर ज्यादा पैसा लगाने पर उन्हें हरा दिया जाता है। पुलिसकर्मी की पत्नी के खाते से पैसे किसने उड़ाए?
साइबर फारेंसिक एंड लॉ एक्सपर्ट सोनाली गुहा ने बताया कि पहले बदमाश सोशल मीडिया, शॉपिंग साइट और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म में ऑनलाइन गेम के ऐड देते हैं। संपर्क करने पर लोगों को वॉट्सऐप, टेलीग्राम ग्रुप में जोड़ते हैं। उन ग्रुप में ज्यादातर लोग इन्हीं के होते हैं। वे नए लोगों को झांसा देने के लिए अपने पैसा जीतने के स्क्रीनशॉट शेयर करते हैं। जब तक व्यक्ति कम रुपए लगाता है। उसे गेम में जिताते हैं और जब वे बड़ी राशि लगाते हैं तो उन्हें हराकर रुपए हड़प लेते हैं। जिस लिंक से बदमाश गेम एप्लिकेशन डाउनलोड कराते हैं, उससे व्यक्ति के मोबाइल का पूरा एक्सेस इनके पास चला जाता है। इसके बाद मोबाइल के फोटो, वीडियो, कॉन्टैक्ट लिस्ट, मैसेज और लोकेशन तक पूरा कंट्रोल ठगों के पास चला जाता है। ठग मोबाइल ऐप से अटैच बैंक खातों से पूरा पैसा निकाल लेते हैं, जिसका कोई मैसेज और ओटीपी तक नहीं आता। किसी के खाते में पैसे नहीं होने पर ये छोटा मोटा लोन तक उठा लेते हैं।

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