सर्दियों का मौसम हो और गजक की बात न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। राजस्थान में जब भी फेमस गजक की बात होती है तो सबसे पहले ब्यावर की तिलपट्टी और भरतपुर की कुटैमा गजक का नाम सबसे पहले आता है। राजस्थानी जायका में हम ब्यावर की मशहूर तिलपट्टी के बारे में आपको बता ही चुके हैं। आज इस कड़ी में आपको रूबरू करवाते हैं भरतपुर की वर्ल्ड फेमस ‘कुटैमा गजक’। इसे लकड़ी के हथौड़े से कूट-कूटकर तैयार किया जाता है। करीब 35-40 बार हथौड़ी की मार से इसके एक-एक पीस को सॉफ्ट बनाया जाता है। इसकी शुरुआत की कहानी बड़ी ही रोचक है। वो क्या है आइए आपको बताते हैं… ग्राहक की शिकायत पर बनाई कुटैमा, हुई वर्ल्ड फेमस आनंद स्वरूप गजक के ओनर महेश चंद ने बताया कि ‘कुटैमा गजक’ की शुरुआत उनके पिता आनंद स्वरूप ने 1960 में की थी। पिता कई वैरायटी की गजक बनाने में माहिर थे। उस जमाने में गुड़ और तिल की साधारण गजक ही ज्यादा चला करती थी। लेकिन कुटैमा का आइडिया एक ग्राहक की शिकायत के बाद आया। शुरुआती समय में पिता आनंद स्वरूप के पास कई ऐसे लोग आए जो, बुजुर्ग थे। वह गजक नहीं खा सकते थे। एक दिन एक बुजुर्ग ग्राहक ने शिकायत लेकर आया कि उनकी गजक चबाई नहीं जाती। दांत में गजक का तिल फंस जाता है, जो पूरा स्वाद खराब कर देता। कोई ऐसी गजक तैयार करो जिसे बिना दांत वाले खा सकें। फिर क्या था। पिता ने गजक की ऐसी वैरायटी तैयार करने की सोची जो मुंह में रखते ही घुल जाए। आनंद स्वरूप ने लकड़ी के हथौड़े बनवाए और कूट-कूटकर गजक तैयार करने पर कई एक्सपेरिमेंट किए। न तिल साबुत रहेंगे और न ही किसी के दांतों में फसेंगे। इसी कॉन्सेप्ट को ध्यान में रखते हए कुटैमा गजक तैयार कर बेचना शुरू किया। तभी से यह कुटैमा गजक का स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ गया। आज आनंद स्वरूप एंड संस गजक का ब्रांड बन गया है। हथौड़े की 35-40 मार से बनती है सॉफ्ट महेश चंद ने बताया कि गजक को सॉफ्ट बनाने में एक खास ट्रिक का इस्तेमाल किया जाता है। लकड़ी के हथौड़े से एक पीस को 35-40 बार कूटा जाता है। इससे तिल सॉफ्ट हो जाते हैं और अंदर तक समा जाते हैं। गजक के पीस में केवल चीनी नहीं, तिल का स्वाद पूरी तरह से भर जाता है। महेश चंद ने बताया कि सबसे ज्यादा ‘कुटैमा गजक’ बेचते हैं। कुटैमा गजक का नाम कुटैमा इसलिए रखा गया क्योंकि वह हथोड़े से कूट-कूट कर बनाई जाती है। गजक बनाने के लिए उनके यहां करीब 25 कारीगर लगे हुए हैं। जो दिन में करीब 12 घंटे गजक ही बनाते हैं। क्योंकि सर्दी बढ़ने के साथ-साथ गजक की डिमांड भी बढ़ती है। महेश बताते हैं गजक के लोग इस कदर दीवाने हैं कि इसकी बिक्री रेहड़ी से करते हैं। हालांकि उनकी बासन गेट पर एक दुकान भी है। जहां गजक बेची जाती है लेकिन, ग्राहक दुकान की जगह रेहड़ी पर पहुंचते हैं। पहले पिता आनंद स्वरूप गजक बेचते थे। आज उनके देहांत के बाद इस पुश्तैनी व्यापार की बागडोर वे ही संभाल रहे हैं। तीन बेटे भी इस काम में हाथ बंटाते हैं। अकेले भरतपुर में करोड़ों का कारोबार, विदेशों तक डिमांड आज भरतपुर में कुटैमा गजक की 20-25 बड़ी दुकानें हैं। आनंद स्वरूप एंड संस के अलावा मधुर व्यंजन, परमानंद, त्रिलोकी जैसे कई ब्रांड की गजक बिकती है। यहां की कुटैमा गजक पाली, बीकानेर, जयपुर से लेकर उत्तर प्रदेश के आगरा, लखनऊ, मेरठ और दिल्ली तक सप्लाई होती है। वहीं इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब, अमेरिका में रहने वाले प्रवासी यहां से गजक लेकर जाते हैं। एक सीजन का बिजनेस करोड़ों में होता है। गजक के कारोबार से जिलेभर में 500 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी मिलता है। 12 से ज्यादा वैरायटी की गजक पूरे भरतपुर में 14 वैरायटी की गजक मिलती है। महेश चंद ने बताया कि डायबिटीज मरीजों के लिए वह शुगर फ्री गजक भी बनाते हैं। इसके अलावा अलसी की गजक, मूंगफली की गजक, ड्राईफ्रूट की गजक, केसर बाटी, पट्टी की गजक, रोल वाली गजक, बिस्किट गजक, गुड़ के सेव, खोवा की गजक, तिल के लड्डू भी बनाते हैं। ऐसे तैयार होती है ‘कुटैमा गजक’ आगे बढ़ने से पहले देते चलिए आसान से सवाल का जवाब सैकड़ों साल पुराना है गजक का इतिहास राजघरानों के समय से ही गजक सर्दियों के खान-पान का हिस्सा रही है। राजा अपने सैनिकों को गुड़, चना और तिल खाने के लिए दिया करते थे, ताकि उनके शरीर में जिंक, कैल्शियम, आयरन और विटामिन बी की कमी न रहे। तिल की तासीर गर्म होती है, इसलिए इसे गुड़ के साथ संतुलित मात्रा में ही खाया जाता था। धीरे-धीरे इसी खानपान ने गजक का रूप लिया। ताकि तिल और गुड़ का मिश्रण एकदम बैलेंस रहे। पिछले राजस्थानी जायका में पूछे गए प्रश्न का सही उत्तर ये है ब्यावर की फेमस तिलपट्टी, जो दिखने में किसी पापड़ जैसी लगती है। सफेद तिल और चासनी से बनी ब्यावर की तिलपट्टी राजस्थान ही नहीं बल्कि देश-विदेश में भी महक बिखेर रही है। कारीगर चासनी में मिले तिल को रोटी की तरह बड़े थालों में बेलकर पापड़ जैसा महीन बनाते हैं। बीते 82 सालों से यहां के लोकल कारीगर इसे हाथों से तैयार कर रहे हैं। ब्यावर का यह जायका करोड़ों रुपए का सालाना कारोबार कर रहा है…(CLICK कर पूरा पढ़ें)


