मलेरिया पर शोध : एआई सॉफ्टवेयर आधारित मशीन कुछ सेकेंड में करेगी मलेरिया की पहचान, बीआईटी मेसरा बना रहा उपकरण

आईसीएमआर शोध के लिए दे रहा फंड, पहले ग्रांट के रूप में रिम्स व बीआईटी मेसरा को मिले 25-25 लाख
झारखंड में मलेरिया के मामलों की संख्या अन्य राज्यों की तुलना में अधिक है। रिम्स मलेरिया को लेकर रिसर्च कर रहा है। यह रिसर्च मलेरिया के बोझ को कम करने के लिए, मलेरिया का पता लगाने और परजीवी अवस्था की पहचान करने में त्वरित सहायता के लिए होगा। इसके लिए बीआईटी मेसरा एक एआई आधारित मशीन (लर्निंग टूल) डेवलप कर रहा है। जो सेकेंड के भीतर रोगी के सैंपल को एआई की मदद से एनालिसिस कर बता देगा कि उसमें मलेरिया के पैरासाइट मौजूद हैं या नहीं। रिम्स मेडिसिन विभाग की डॉ. रश्मि सिन्हा और बीआईटी मेसरा की डॉ. आकृति निगम इस रिसर्च की प्रिंसिपल इन्वेस्टीगेटर हैं। इस रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) 1.51 करोड़ रुपए का फंड स्वीकृत किया है। एआई मशीन लर्निंग टूल से होगी सटीक जांच बीआईटी मेसरा के विशेषज्ञों की टीम एक मजबूत मशीन लर्निंग टूल विकसित करने में जुट गई है। जो मलेरिया की पहचान को तेज और सटीक बनाएगा। रिम्स की डॉ. रश्मि सिन्हा ने बताया, उपकरण मरीजों के खून के नमूने की जांच कर कुछ ही सेकंड में रिपोर्ट देने में सक्षम होगा। सिस्टम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सॉफ्टवेयर होगा। 20 हजार सैंपलों का डाटा संग्रह किया जाएगा
डॉ. आकृति ने बताया कि रिसर्च के लिए पहले चरण में एक डाटाबेस तैयार किया जाना है। इसमें करीब 20 हजार सैंपल की इमेजिंग होगी। रिम्स आए मरीजों के अलावा मनोहरपुर व गोइलकेरा से मलेरिया रोगियों के ब्लड सैंपल लिए जाएंगे। यह डाटाबेस एआई आधारित मशीन के साथ लिंक होगा, जो नए सैंपल को एनालाइज करने में मदद करेगा। मलेरिया के निदान में इसलिए कारगर होगी मशीन तेज और सटीक परिणाम : पारंपरिक जांच में समय अधिक लगता है, वहीं एआई मशीन कुछ ही सेकंड में परिणाम दे देगी। परजीवी अवस्था की पहचान : मशीन मलेरिया परजीवी की अवस्था का भी सही-सही विश्लेषण कर पाएगी, जिससे इलाज की दिशा तय करने में मदद मिलेगी। कम मानवीय हस्तक्षेप : पारंपरिक विधियों में जहां लैब टेक्नीशियन और डॉक्टर का अधिक हस्तक्षेप होता है, वहीं इस मशीन से गलत जांच की संभावना कम रहेगी। ग्रामीण इलाकों को लाभ : झारखंड जैसे राज्य में, जहां कई दूरदराज के इलाकों में अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, वहां यह तकनीक मलेरिया के जल्दी निदान और इलाज में मददगार साबित होगी।

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