जैविक खाद को बढ़ावा देने और रसायनिक खाद से बचने को लेकर कृषि विभाग के अधिकारियों ने किसानों को प्रशिक्षण दिया। दूनी सहायक निदेशक सभागार में परम्परागत कृषि विकास योजना के तहत कृषक प्रशिक्षण का आयोजन किया गया। इसमें किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड में की गई सिफारिश के अनुसार खाद प्रयोग करने की सलाह दी गई। कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक वीरेन्द्र सिंह सोलंकी ने कहा कि परम्परागत खेती वर्तमान समय की आवश्यकता है। अंधाधुंध उर्वरक प्रयोग से मिट्टी की उर्वरा क्षमता कमजोर होती है, साथ ही मानव स्वास्थय पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है। ऐसे में किसान अपनी मृदा की जांच प्रयोगशाला में कराये एवं कृषि वैज्ञानिकों की सिफारिश के अनुसार ही खाद का फसलों में डाले।
मिट्टी एवं पानी की जांच कराकर उसकी रिपोर्ट के मुताबिक फसलों की बुवाई करे। जांच के महज 5 रुपये शुल्क है। संतुलित उर्वरक उपयोग से मृदा की उर्वरा शक्ति बनी रहती है एवं उत्पादन क्षमता भी बनी रहती है। सहायक निदेशक बाबूलाल यादव ने कहा कि कृषि विभाग की कई प्रकार की योजनाएं हैं, जिनका किसान ऑनलाइन आवेदन कर लाभ उठा सकते हैं। सरसों की फसलों में रोग का प्रकोप दिखाई दे तो कृषि पर्यवेक्षक एवं सहायक कृषि अधिकारी से संपर्क कर सलाह ले सकते है। जैविक खेती करने पर दिया जोर
सहायक निदेशक दुर्गा शंकर कुम्हार ने जैविक खेती पर व्याख्यान देते हुए कहा कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती आवश्यक है। किसान अधिक से अधिक जैविक उत्पादन करे। कृषि अधिकारी कजोड़मल गुर्जर ने रबी फसल में प्रमुख कीट एवं व्याधियों के लक्षण एवं नियंत्रण पर जानकारी दी। इस अवसर पर मधुमक्खी उत्कृष्ठता केन्द्र के उपनिदेशक डॉक्टर फतेह सैनी ने फसलों में हानिकारक कीटों का प्राकृतिक विधियों से नियंत्रण एवं कृषि विश्वविद्यालय कोटा के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉक्टर रतन लाल सुवालका ने जैविक खाद का निर्माण एवं जैविक कीट नियंत्रण पर व्याख्यान दिया। इस अवसर पर सहायक कृषि अधिकारी रामावतार उपाध्याय, कृषि पर्यवेक्षक गैरोली शंकर लाल बैरवा, रेखा गुर्जर कृषि पर्यवेक्षक घाड़, भगवान मीणा चांदसिंह पुरा, मुकेश खींची चांदली, रामफूल गुर्जर, बिरधी चन्द कुमावत, प्रहलाद धाकड़, मानसिंह मीणा, रमेश बैरवा सहित अनेक प्रगतिशील किसान मौजूद थे।


