स्टूडेंट्स की सुसाइड रोकने सुप्रीम कोर्ट ने बनाई टास्क फोर्स:कहा- कॉम्पिटीशन और परफॉर्म करने का प्रेशर खतरनाक; IIT-दिल्ली के छात्रों के आत्महत्या से जुड़ा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्कोर बेस्ड एजुकेशन सिस्टम में परफॉर्म करने का प्रेशर और टॉप एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स में लिमिटेड सीटों के लिए बढ़ता कॉम्पीटिशन स्टूडेंट्स की मेंटल हेल्थ पर भयानक बोझ डालता है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा- यूनिवर्सिटीज न केवल लर्निंग सेंटर बनें, बल्कि छात्रों के कल्याण और विकास के लिए जिम्मेदार संस्थान की भूमिका भी निभाएं। बेंच ने आगे कहा कि अगर वे ऐसा करने में असफल रहते हैं, तो शिक्षा का असली उद्देश्य यानी जीवन को सशक्त, सक्षम और परिवर्तित करना ही अधूरा रह जाएगा। बेंच ने छात्रों की मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याओं और आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए ‘नेशनल टास्क फोर्स’ (NTF) बनाने का आदेश दिया। दरअसल यह आदेश IIT दिल्ली में पढ़ने वाले दो स्टूडेंट्स की आत्महत्या से जुड़े मामले पर सुनवाई के दौरान आया। दिल्ली हाईकोर्ट ने जनवरी 2024 में पुलिस को FIR दर्ज करने से मना कर दिया था, जिसके खिलाफ छात्रों के माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि परिवार की शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की जाए और मामले की जांच की जाए। एनटीएफ की अगुवाई करेंगे पूर्व जस्टिस रविंद्र भट कॉलेजों को माता-पिता की तरह भूमिका निभानी होगी कोर्ट ने कहा कि कॉलेजों में जातिगत भेदभाव व्याप्त है, जिससे वंचित समुदायों के छात्रों में अलगाव की भावना बढ़ रही है। कॉलेज परिसरों में जाति आधारित भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 15 का स्पष्ट उल्लंघन है, जो जाति के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। जब छात्र अपने घरों से दूर जाकर कॉलेजों में पढ़ते हैं, तो विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को लॉको पेरेंटिस (अभिभावक की भूमिका) निभाने की जरूरत है। कॉलेजों को सिर्फ नियम लागू नहीं करना है, बल्कि संकट की घड़ी में छात्रों को भावनात्मक सहारा भी देना है। 13,000 से ज्यादा छात्रों ने आत्महत्या की – एनसीआरबी रिपोर्ट राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, 13,000 से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की, जो पिछले दशक की तुलना में लगभग दोगुना है। 2022 के आंकड़ों में आत्महत्याओं में 7.6% हिस्सेदारी छात्रों की थी, जिनमें से 1.2% मामलों की वजह करियर या प्रोफेशनल समस्याएं और 1.2% परीक्षा में असफलता रही।

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