झारखंड हाईकोर्ट ने मकान मालिक और किरायेदार से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि बेदखली मामलों में मकान मालिक ही यह तय कर सकता है कि उसकी कौन सी संपत्ति उसकी जरूरतों के लिए आवश्यक है। किरायेदार यह तय नहीं कर सकता कि मकान मालिक को कौन सा परिसर खाली करवाना चाहिए। हाईकोर्ट के जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने किरायेदार की इस दलील को खारिज कर दिया कि मकान मालिक के पास वैकल्पिक परिसर उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि कानून स्पष्ट है कि बेदखली की जरूरत वास्तविक होनी चाहिए, न कि केवल इच्छा। यह फैसला टाइटल इविक्शन सूट से जुड़ी दूसरी अपील में आया। ट्रायल कोर्ट ने मकान मालिक के पक्ष में फैसला दिया था, जिसे अपीलीय न्यायालय ने भी बरकरार रखा। मालूम हो कि एक किराये की संपत्ति से जुड़े मामले में, जिसे किरायेदार ने यह कहते हुए खाली करने से इनकार कर दिया कि मकान मालिक का अनुरोध सद्भावनापूर्ण नहीं है और आंशिक बेदखली से काम चल सकता है। ट्रायल कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया और कहा कि मकान मालिक का दावा वैध है। अपीलीय न्यायालय ने भी इस पर सहमति जताई। दूसरी अपील में किरायेदार ने देरी, सीमा और रोक का हवाला देते हुए दावा खारिज करने की मांग की। उसने यह भी कहा कि मकान मालिक के पास अन्य विकल्प हैं। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि झारखंड भवन (लीज, किराया और बेदखली) नियंत्रण अधिनियम, 2000 की धारा 14 के तहत पारित आदेश के बाद धारा 14(8) लागू हो जाती है और दूसरी अपील स्वीकार नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि दूसरी अपील में केवल वही कानूनी प्रश्न उठाए जा सकते हैं, जो सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के तहत उचित रूप से तैयार और वारंट किए गए हों। हाईकोर्ट ने कहा कि किरायेदार ने एक दशक से ज्यादा समय तक मुकदमेबाजी जारी रखी, जबकि तथ्य और कानून दोनों उसके खिलाफ थे। कोर्ट ने दूसरी अपील खारिज कर दी, अंतरिम रोक हटा दी और ट्रायल कोर्ट को रिकॉर्ड लौटाने का आदेश दिया।


