कृषि वैज्ञानिकों के बरसों के शोध और मेहनत से जौ की ऐसी किस्म तैयार हो रही है, जिसके छिलके नहीं होंगे। इसका सबसे बड़ा फायदा होगा कि आने वाले समय में लोग इसे गेहूं–बाजरा की तरह खाने में काम ले सकेंगे। इससे किसानों को भी काफी फायदा होगा। यह कम पानी में पक जाएगी। दूसरी फसलों के मुकाबले में इसका उत्पादन भी ज्यादा होगा। साथ ही भाव भी अच्छे मिलेंगे। राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान दुर्गापुरा के कृषि फॉर्म पर वर्ष 2016 से यह प्रोजेक्ट चल रहा है। इसके तहत आरडी 3088 से 3092 नाम की किस्में विकसित की जा रही हैं। अब अग्रिम परीक्षण के लिए आईसीआर में एंट्री को भेजी गई है। बिना छिलके जौ को नेक्ड बार्ले, हल लैस एवं फूड बार्ले कहा जाता है। इसका चारा भी पौष्टिक होगा। इन किस्मों को अलग–अलग जलवायु व मिट्टी में उगाने के लिए कई प्रयोग किए जा रहे हैं। कृषि संस्थान के अलावा खेतों में भी इसका परीक्षण किया जा रहा है। इसके सकारात्मक रिजल्ट मिले हैं। प्रारंभिक परीक्षण के स्टेज को पूरा किया जा चुका है। आईसीआर से अनुमोदित होने के बाद किसानों तक पहुंचने में एक से दो साल का समय लगेगा। राजस्थान में सबसे ज्यादा जौ उत्पादन होता है। यहां देश का 60 से 70 प्रतिशत जौ उत्पन्न होता है। राजस्थान के बाद एमपी, यूपी, पंजाब और हरियाणा का नंबर आता है। देश में कम एरिया में जौ की बुवाई होने से आज विदेशों से आयात करनी पड़ रही है। हाई प्रोटीन और बेड कॉलेस्ट्रोल घटाने में सहायक होगी बिना छिलके वाली जौ हाई प्रोटीन युक्त होगी। इसमें 10 से 13 प्रतिशत तक प्रोटीन होगा। वहीं बीटा ग्लूकॉन की मात्रा 5 से 6 प्रतिशत होगी। यह हार्ट के लिए अच्छी रहेगी। इससे बेड कॉलेस्ट्रोल घटेगा। नर्वस सिस्टम को सुधारने में भी सहायक होगी। इसमें कई प्रकार के सूक्ष्म तत्व भी होंगे। जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होंगे। जौ का ग्लाइसिम इंडेक्स 25-30 के बीच है, जबकि गेहूं–चावल में यह 60 से ऊपर रहता है। ऐसे में शुगर के मरीजों के लिए जौ की ये किस्में काफी फायदेमंद साबित होंगी। इसके सेवन से शुगर की बीमारी को कम करने में मदद मिलेगी। 4 माह से कम समय में पकेगी गेंहू के मुकाबले, जौ की फसल कम पानी एवं खारे पानी में भी होगी। 40 से 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर इसकी पैदावार होगी। कहीं उपयुक्त मिटी–जलवायु पर उत्पादन इससे ज्यादा भी संभव है। यह 120 दिन से भी कम में पक जाएगी। इससे पहले राजस्थान में जौ का औसत उत्पादन 36 क्विंटल माना गया है। वहीं, देश का औसत लगभग 30 क्विंटल निर्धारित है। प्रदेश में अब 4 लाख से ज्यादा हेक्टेयर में जौ की फसल ली जा रही है।


