बालोद में 500 मीटर लंबी चुनरी यात्रा:गंगा मैया को चुनर चढ़ाने सैकड़ों भक्त जुटे; 110 साल पहले तालाब में मिली थी मां की प्रतिमा

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के ग्राम झलमला में चैत्र नवरात्रि के अवसर पर भव्य चुनरी यात्रा का आयोजन किया गया। प्रसिद्ध मां गंगा मैया मंदिर में निकाली गई इस यात्रा में हजारों की संख्या में भक्त शामिल हुए। यात्रा में 500 मीटर लंबी चुनरी को लेकर भक्तगण पूरे गांव का भ्रमण करते हुए नजर आए। डीजे और धूमल की धुनों पर श्रद्धालु झूमते रहे। भ्रमण के बाद चुनरी को मां गंगा मैया को समर्पित किया गया। ग्रामीण बताते है कि प्रसिद्ध मां गंगा मैया मंदिर की कहानी 110 साल पुरानी है। मैया का प्रादुर्भाव एक तालाब से शुरू हुआ था। एक बैगा के स्वप्न में मां ने दर्शन दिया जिसके बाद मंदिर में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। युवाओं ने की थी इस परंपरा की शुरुआत जिला पंचायत सदस्य पूजा साहू ने कहा कि वे इस आस्था के महापर्व में शामिल होकर खुद को भाग्यशाली मानती हैं। आयोजक समिति के सदस्य आदित्य दुबे ने बताया कि यह आयोजन हर साल चैत्र नवरात्र में किया जाता है। दुबे ने यह भी बताया कि इस परंपरा की शुरुआत युवाओं ने की थी। धीरे-धीरे इसे सभी वर्गों का समर्थन मिला और अब पूरा गांव इस आयोजन में भाग लेता है। उन्होंने कहा कि मां गंगा मैया के गांव में निवास करने के कारण सभी ग्रामवासी खुद को सौभाग्यशाली मानते हैं। इस चुनरी यात्रा से सभी ग्रामवासियों की आस्था जुड़ी हुई है। मंदिर से जुड़ी कहानी मां गंगा मैया की कहानी अंग्रेज शासनकाल से जुड़ी हुई है। आज से तकरीबन 110 साल पहले जिले की जीवनदायिनी तांदुला नदी के नहर का निर्माण चल रहा था। इस दौरान झलमला गांव की आबादी महज 100 थी। सोमवार के दिन ही यहां बाजार लगता था। जहां दूरस्थ अंचलों से पशुओं के विशाल समूह के साथ सैकड़ों लोग आया करते थे। पशुओं की अधिकता से पानी की कमी महसूस की जाती थी। पानी की कमी को पूरा करने के लिए तालाब बनाने डबरी की खुदाई की गई। जिसे बांधा तालाब नाम दिया गया। मां गंगा मैया के प्रादुर्भाव की कहानी इसी तालाब से शुरू होती है। जिस जगह पर वर्तमान में देवी की प्रतिमा स्थापित है, वहां पहले तालाब था, जहां पानी भरा रहता था। कहते हैं कि किवदंती अनुसार एक दिन ग्राम सिवनी का एक केवट मछली पकड़ने के लिए बांधा तालाब में गया। तब जाल में मछली की जगह पत्थर की प्रतिमा फंस गई। केंवट ने अज्ञानतावश उसे साधारण पत्थर समझ फिर से तालाब में फेंक दिया। मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा गांव के गोंड़ जाति के बैगा को सपने में आकर कहा कि मैं जल के अंदर पड़ी हूं। मुझे जल से निकालकर प्राण प्रतिष्ठा कराओ। स्वप्न आने की जानकारी बैगा ने मालगुजार व गांव के अन्य लोगों को जानकारी दी। जाल फेंके जाने पर वही प्रतिमा फंसी। समझा साधारण पत्थर देवी मां की प्रतिमा को लेकर कई किवदंती प्रचलित है। केंवट के जाल में बार-बार फंसने के बाद मूर्ति को साधारण पत्थर समझकर फेंकने की घटना को वर्तमान में भी यहां के निवासरत लोग अपनी पूर्वजों से मिली जानकारी अनुसार सही मानते हैं। सभी ने मिलकर प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कराई। जल से प्रतिमा निकली, इस वजह से गंगा मैया के नाम से पहचान बनी।

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