मां जगदंबा का कौशिकी अवतार जीव पर कृपा और दया करने हुआ: शास्त्री

भास्कर न्यूज | राजनांदगांव प्रत्येक नारी सम्माननीय है, नारी का मूल स्वरूप ही मां का होता है। नारी का रस शृंगार में होता है शृंगार की बात वह ध्यान से सुनती है। इस कारण उसका हृदय कोमल होता है। उक्त उदगार आज गायत्री शक्तिपीठ में महेश्वरी समाज द्वारा आयोजित श्रीमद देवी भागवत के पांचवें दिन व्यास पीठ से शास्त्री ईश्वर चंद व्यास ने व्यक्त की। उन्होंने कहा मां जगदंबा का कौशिकी अवतार जीव पर कृपा और दया करने हुआ था। उन्होंने आज माता के हाथों चंड- मुंड, रक्त बीज एवं शुंभ- निशुंभ के संहार की कथा सुनाई। उन्होंने नारी शक्ति के बारे में कहा कि नारी प्रेम की प्रतिमूर्ति है, नारी को सम्मान की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। नारी का मूल स्वरूप मां का है। वह अलग-अलग रूपों में अपने कर्तव्य का पालन करती है। पति के साथ उसका संबंध माधुर्यता का होता है तो वहीं बच्चों के साथ उसका संबंध वात्सल्य का होता है। कहीं वह मां होती है तो कहीं पत्नी, कहीं बेटी, कहीं बहु एवं सास होती है। कथा से पूर्व डोंगरगढ़ से पहुंचे हनी गुप्ता एवं मां बम्लेश्वरी ट्रस्ट की टीम ने शास्त्री जी का सम्मान कर आशीर्वाद लिया। दुर्ग से चतुर्भुज राठी एवं उनके साथियों ने भी शास्त्री जी का सम्मान कर आशीर्वाद लिया। माहेश्वरी समाज के अध्यक्ष पवन डागा ने बताया 4 अप्रैल को अन्नकूट एवं 56 भोग का आयोजन किया गया है। मां जगदंबा ने चंड-मुंड का संहार कर चामुंडा कहलाई उन्होंने कहा िक नारी हर रूप में वह अपने कर्तव्यों का बखूबी पालन करती है। नारी का स्थान ऊंचा है। मां जगदंबा ने चंड-मुंड का संहार किया इस कारण वह चामुंडा कहलाती है। अगर काल हमारे विपरीत होता है तो काल के आगे हमारी नहीं चलती, काल के अधीन ही सब होते हैं, मां का आशीर्वाद रहा तो काल अपना रुख बदल देता है।

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