ओपीडी में 25 फीसदी मरीज सांस से जुड़े शहर में ठंड और वायु प्रदूषण का असर बच्चों से लेकर युवाओं और बुजुर्गों तक पर दिखाई देने लगा है। दिन और रात का तापमान तेजी से गिरा है। अस्पतालों की ओपीडी में सांस फूलने और दमा की शिकायत लेकर आने वाले मरीजों की संख्या 25 फीसदी तक पहुंच गई है। पिछले साल दिसंबर में रोजाना ऐसे 300 मरीज आ रहे थे, लेकिन इस बार यह आंकड़ा 500 तक पहुंच गया है। गंभीर मामलों में युवाओं को भी भर्ती कर स्टेरॉयड देना पड़ रहा है। गंभीर मामलों में मरीजों को नेबुलाइजर और ऑक्सीजन थेरेपी की जरूरत पड़ रही है। जेपी अस्पताल के पल्मोनरी एक्सपर्ट डॉ. अंकित तोमर ने बताया, प्रदूषण और ठंड से पुराने दमा रोगियों और कमजोर इम्युनिटी वाले बच्चों में समस्या गंभीर हो रही है। अस्पतालों में सांस फूलने की शिकायत वाले मरीजों की संख्या 25% तक पहुंच गई है। उन्होंने बताया कि प्रदूषण के कारक पीएम 2.5(धूल-धुएं के बारीक कण) सांस लेने के दौरान फेफड़ों में चिपक जाते हैं। इससे सीवियर क्रॉनिकल डिजीज होने का खतरा बढ़ जाता है। धूल के बारीक कण फेफड़ों में चिपक रहे पिछले साल इसी समय 300 से ज्यादा मरीज हर दिन आते थे अब 500 से ज्यादा मरीज हर दिन अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं एक्यूआई घटा, लेकिन समस्या बढ़ी जेपी समेत कई प्राइवेट अस्पतालों में बेड फुल रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ रेस्पिरेटरी डिजीज (आरआईआरडी) के प्रोफेसर डॉ. निशांत श्रीवास्तव ने बताया कि 15 नवंबर से 11 दिसंबर तक हर दूसरे दिन राजधानी में सांस से जुड़े मरीजों को करीब 50 मरीजों को भर्ती करना पड़ रहा है। जेपी अस्पताल में एक्यूट रेस्पीरेटरी विभाग के बेड फुल होने के बाद आईसीयू वार्ड में भी मरीजों को रखना पड़ा। प्राइवेट अस्पतालों के बेड भी फुल हैं। हैंड-फुट और माउथ डिजीज भी बढ़ रही अस्पतालों में हैंड फुट माउथ डिजीज (एचएफएमडी) के मामले भी तेजी से सामने आ रहे हैं। यह बीमारी बच्चों के हाथ, पैर और चेहरे पर रैश (दाने) के रूप में दिखती है। अगर संक्रमित बच्चा स्कूल जाता है, तो यह अन्य बच्चों में भी फैल सकती है। प्रदूषण से सांस की तकलीफ के साथ गले में खराश, बुखार और अस्थमा के मामले बढ़ गए हैं। ठंड के कारण बच्चों और बुजुर्गों के साथ युवा भी प्रभावित हो रहे हैं।


