नाटक विराट रूप में गूंजा श्रीकृष्ण का संदेश:महाभारत के पात्रों के माध्यम से मिला जीवन का सार, केएल कलावत ने किया निर्देशन

कला संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग एवं कलावत कलामंच संस्था की देखरेख में आयोजित नाट्य महोत्सव के दूसरे दिन कन्हैयालाल कलावत की ओर से लिखित एवं निर्देशित नाटक ‘विराट रूप’ का दूसरा भाग प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में विधायक बालमुकुंदाचार्य, विशिष्ट अतिथि महेश कुमार शर्मा व ब्रजेश कुमार शर्मा समेत कई लोग मौजूद रहे। नाटक के समापन दृश्य में भगवान कृष्ण का यह सशक्त संदेश दर्शकों को झकझोर गया कि भूलवश हुई गलती के लिए आत्महत्या नहीं करनी चाहिए, बल्कि आत्मबोध और सुधार का मार्ग अपनाना चाहिए। नाटक में महाभारत के विभिन्न पात्रों के माध्यम से आज के अर्जुन को विवेक और अविवेक की सीख दी जाती है। जीवन को सुदृढ़ करने के लिए निरंतर कर्म आवश्यक जब अर्जुन जीवन को मजबूत बनाने का उपाय पूछता है, तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि कलियुग में अधिक से अधिक कौशल अर्जित करना, नशा, हिंसा व गलत कार्यों से दूर रहकर निरंतर कर्म करते रहना ही बुरे विचारों को रोकने का श्रेष्ठ उपाय है। नाटक में भीष्म, गांधारी, धृतराष्ट्र, द्रौणाचार्य, द्रौपदी, अश्वत्थामा जैसे पात्रों के जीवन से अर्जुन को यह सिखाया गया कि कैसे एक गलत निर्णय या अंधभक्ति जीवन को कलंकित कर सकती है। भीष्म की चुप्पी, गांधारी का पुत्र मोह, अश्वत्थामा की क्रूरता – इन सबका उदाहरण देकर कृष्ण ने जीवन में विवेकपूर्ण निर्णय लेने पर बल दिया। अर्जुन जब पूछता है कि कलियुग में कृष्ण द्रौपदी की लाज बचाने कैसे आएंगे, तो कृष्ण उत्तर देते हैं कि जिस प्रकार द्रौपदी ने उन्हें सच्चे मन से पुकारा, आज के युवा भी वैसे ही भाव से उन्हें स्मरण करें। मोबाइल के चक्रव्यूह से निकलकर बहन-बेटियों की रक्षा के लिए खड़े हों। विराट रूप के दर्शन और प्रेरणा से भरा मंचन नाटक के अंतिम दृश्य में भगवान कृष्ण के विराट रूप का चित्रण किया गया। जिसमें उन्होंने कहा- मैं ही सृष्टि का आरंभ, विस्तार और विनाश हूं। यह रूप अनन्य भक्ति से ही संभव है। देवता भी जिसे देखने को तरसते हैं, वह विराट रूप आज तुम देख रहे हो। इस विराट दर्शन के माध्यम से कृष्ण ने प्रेम, दया, सेवा, आत्मज्ञान, मित्रता, कौशल जैसे गुणों को जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया। कलाकारों का अभिनय रहा प्रभावशाली नाटक में कन्हैयालाल कलावत, भारती प्रजापति, जितेन्द्र सिंह, अमन तंवर, प्रथम मित्तल, राहुल पंवार, अंजलि शर्मा व निकिता सैनी ने प्रभावी अभिनय प्रस्तुत किया। संगीत-अभिषेक विजय, मेकअप-ज्योत्सना कौशिक, प्रकाश व्यवस्था-विमल ​का रहा। कार्यक्रम के अंत में कलाकारों को सम्मानित किया गया। बालमुकुंदाचार्य ने समापन संबोधन में कहा कि युवाओं को ऐसे नाटकों के माध्यम से भारतीय संस्कृति को जानने और अपनाने का प्रयास करना चाहिए। संस्था की ओर से सभी अतिथियों एवं दर्शकों का आभार व्यक्त किया गया।

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