कोटा ग्रामीण के अरंडखेड़ा गांव में दशमी के दिन रविवार की रात रावण दहन हुआ। चैत्र मास की दशमी को रावण दहन करने की गांव में यह बरसों पुरानी परंपरा है। चैत्र नवरात्रि खत्म होने के बाद दशमी के दिन रावण दहन किया जाता है। ग्रामीण इस दिन जीवंत झांकियां बनाते गांव में मेला भरता है। शोभा यात्रा निकाली जाती है और रावण के पुतले को तैयार कर विधि विधान से पूजा अर्चना कर दहन किया जाता है। समाजसेवी वरुण रस्सेवट ने बताया- आमतौर पर दिवाली से पहले नवमी के बाद दशमी पर रावण दहन होता है। लेकिन कोटा में कई स्थानों पर रावण दहन चैत्र नवरात्र के बाद भी होता है। ऐसा ही आयोजन कोटा के ग्रामीण अरंडखेड़ा कस्बे में 55 फीट के रावण के दहन के साथ हुआ। यह परंपरा करीब 100 साल से चली आ रही है। कोटा से 25 किमी. दूर स्थित अरण्डखेड़ा कस्बे में दशहरे की तरह रावण का दहन किया जाता है। रस्सेवट ने बताया- हर साल की तरह इस दशमी को भी अरंडखेड़ा गांव में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। रावण दहन से पहले भव्य शोभायात्रा निकाली गई। समाजसेवी वरूण रस्सेवट, दीपिका सिंह, विभोर ने शोभायात्रा प्रांरभ की जो कि गांव के प्रमुख इलाकों से निकलते हुए रावण दहन स्थल पर पहुंची। दीपिका सिंह ने बताया- शोभायात्रा के बाद रावण दहन स्थल पर विधि विधान से पूजा अर्चना की गई ओर फिर अंत मे रावण दहन किया गया। जिसमें रावण का दहन हुआ। यह परंपरा सालो से चली आ रही है। गांव में साल में दो बार रावण का दहन किया जाता है। दीपिका सिंह ने बताया-पहले केवल कोटा के दशहरा मैदान में रावण दहन हुआ करता था। उस समय गांव के लोग कई बार कोटा नही जा पाते थे। इस संबन्ध में जब राज परिवार से बात की गई तो उन्होंने चैत्र नवरात्र के बाद रावण दहन की आज्ञा दी और उसके बाद गांव में रावण दहन की परंपरा शुरू हुई। गांव में रावण का पुतला बनाया जाने लगा और अब पुतले का दहन किया जाता है। इस अवसर पर समस्त ग्रामवासी उपस्थित रहते हैं। ग्रामीण बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मिलजुल कर कार्यक्रम आयोजित किया जाता है l


