भास्कर न्यूज | अमृतसर विजिलेंस की तरफ से किला गोबिंदगढ़ स्थित ऑटोमेटेड ड्राइविंग टेस्ट ट्रैक पर छापेमारी किए जाने के बाद तीसरे दिन बुधवार को कोई भी काम नहीं हुआ। यहां आवेदक ड्राइविंग टेस्ट देने के लिए तो पहुंचे मगर उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि विजिलेंस की ओर से कंप्यूटर आदि जब्त किए जाने के कारण काम नहीं हो पाएगा। लर्निंग लाइसेंस और पक्के ड्राइविंग लाइसेंस बनाने वाले आवेदक धूप में इंतजार करते रहे, मगर बिना काम ही उन्हें वापस जाना पड़ा। बुधवार को 200 के करीब लोग परेशान हुए। अब इन लोगों को शुक्रवार को फिर से दफ्तर में आना होगा। कई लोग तो ऐसे थे जो काम से छुट्टी करके यहां पर पहुंचे थे। विजिलेंस की ट्रैक पर रेड किए जाने का खामियाजा लोगों को ही भुगतना पड़ा। ट्रांसपोर्ट विभाग में सिर्फ ड्राइविंग लाइसेंस के विभाग में ही गड़बड़ियां नहीं है। विभाग के अधीन आते चालान विभाग और आरसी विभाग में भी पिछले लंबे समय से कई गड़बड़ियां सामने आ चुकी हैं। चालान विभाग में तो एजेंटों का इतना बोलबाला हो चुका है कि वह लोग आधे रेट में चालान निकलवाकर लोगों को दे देते हैं। अगर ऐसा हो रहा है तो साफ है कि एजेंट की चालान विभाग में बैठे कर्मचारियों के साथ कहीं न कहीं मिलीभगत जरूर है, यही कारण है कि यह चालान अंदर से निकलवाकर आधे रेट में दे देते हैं। इसी तरह आरसी बनाने वाले विभाग में भी एजेंटों का ही बोलबाला है। यहां पर आम लोग अगर काम करवाने के लिए आ जाते हैं तो उनसे कई बार चक्कर लगवाए जाते हैं, लेकिन उसका काम नहीं होता, अगर कोई एजेंट आ जाता है तो उसका पहल के आधार पर काम हो जाता है। रेड के बाद तीसरे दिन भी विजिलेंस की ओर से दफ्तर ट्रांसपोर्ट विभाग के कर्मचारी और पंजाब स्टेट ट्रांसपोर्ट सोसायटी के कर्मचारियों को बुलाया गया था। उनसे पूछताछ चलती रही। वहीं ड्राइविंग लाइसेंस बनाने में गड़बड़ी करने के तार दूसरे जिलों के साथ भी जुड़े हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक, लुधियाना में पकड़े गए पंजाब स्टेट ट्रांसपोर्ट सोसायटी के अधीन काम कर रहा कर्मचारी पुनीत ही अकसर अमृतसर में तैनात कई कर्मचारियों के संपर्क में रहकर उनसे काम करवाता रहा है। पुनीत अमृतसर में काम कर चुका है तो उसका नेटवर्क अमृतसर में भी पूरी तरह से फैला हुआ है। उसके मोबाइल की फॉरेंसिक जांच में इसके तार भी जुड़े हुए मिल रहे हैं। लुधियाना में गिरफ्तार पुनीत इससे पहले स्मार्ट चिप कंपनी में काम कर चुका है। इस कंपनी के बाद वह सोसायटी में भर्ती हो गया। ज्यादातर स्मार्ट चिप कंपनी के कर्मचारी सोसायटी में ही भर्ती हो रहे हैं। कई ऐसे कर्मचारी भी हैं जो बड़े-बड़े घोटाले कर चुके हैं और उन्हें स्मार्ट चिप कंपनी से निकालकर सोसायटी में लगाया हुआ है। अब यहां सवाल उठता है कि ट्रांसपोर्ट विभाग के अधिकारी नए लोगों को नौकरी देने की बजाय इन पर ही ज्यादा मेहरबान क्यों हैं।


