जयपुर परकोटा की पूरन जी की हींग जेल कचौरी:ताजा दही और सूखी काचरी की चटनी से करते हैं सर्व, 65 सालों से नहीं बदला स्वाद

वर्ल्ड हेरिटेज में शुमार जयपुर परकोटा में जायकों की कोई कमी नहीं है। यहां की मशहूर खूंटेटा की कचौरी, संपत की कचौरी, सम्राट के समोसे, एलएमबी के घेवर, साहू और गुलाब जी की चाय जैसे स्वाद से आप रूबरू हो चुके हैं। आज राजस्थानी जायका सीरीज में हम आपको लेकर चलते हैं चौड़ा रास्ता की पूरन जी कचौरी वाले के यहां। शहर का 65 साल पुराना यह जायका दही और काचरी की चटनी के साथ सर्व होता था। हींग जेल में तैयार होने वाली तीखी और खस्ता कचौरी खाने के लिए लोगों की लाइन लगती है। चौड़ा रास्ता पर बैंक वाली गली में दाखिल होते ही हींग की चटाखेदार महक आपको पूरन जी कचौरी वाले की शॉप पर पहुंचा देगी। चौड़ा रास्ता के इस छोटी सी गली में सुबह-सुबह लंबी लाइन लगना आम बात है। जयपुर के कई लोगों का नाश्ता इसी कचौरी से होता है। टूरिस्ट भी नाम सुनकर यहां तक खिंचे चले आते हैं। दुकान के ओनर गोविंद ने बताया यह दुकान 1963 से इसी गली में है। इसकी शुरुआत मेरे दादा पूरण जी ने की थी। पहले परिवार दौसा के लालसोट में रहता था। दादा पूरण वहां हलवाई थे। काम की तलाश में 60 के दशक में जयपुर आए। तब उन्होंने किशनपोल बाजार स्थित राष्ट्रीय मिष्ठान भंडार, समेत कई मशहूर स्वीट शॉप्स पर काम किया। लेकिन खुद का बिजनेस करने के लिए उन्होंने चौड़ा रास्ता में 1963 में यहां किराए पर दुकान ली। उस जमाने में परकोटा में दाल की कचौरी खूब बिकती थी। लेकिन उसमें कोई भी हलवाई हींग का इस्तेमाल नहीं होता था। ओनर गोविंद ने दावा किया कि तब जयपुर में पहली बार दादा पूरण जी ही हींग वाली कचौरी लेकर आए। मोगर दाल के साथ हींग के तड़के का स्वाद लोगों की जुबां पर चढ़ गया। चूंकि कचौरी मसालेदार होती थी और उसकी तासीर को बैलेंस करने के लिए ताजा दही के साथ इसे सर्व किया। कचौरी का टेस्ट ऐसा था कि लोग बिना चटनी के दही के साथ खाते थे। काचरी की चटनी के साथ मिलती है ये कचौरी ओनर गोविंद ने बताया कि दादाजी यहां सिर्फ कचौरी बेचते थे, उसके साथ चटनी नहीं देते थे। उनका मानना था कि कचौरी अगर चटनी के साथ सर्व करनी पड़ रही है तो उसका असली स्वाद बिगड़ जाता है। हमने जब वर्ष 2000 में दुकान संभाली तब कचौरी के साथ चटनी भी देना शुरू किया। क्योंकि यहां बाहर से आने वाले टूरिस्ट भी कचौरी के साथ चटनी की डिमांड करते थे। कुछ हटकर स्वाद लाने के लिए हमने खट्टेपन के लिए इमली की बजाय सूखी काचरी का इस्तेमाल कर खुद के फॉर्मूले से चटनी तैयार की। कचौरी के साथ कढ़ी नहीं, दही का कॉन्सेप्ट गोविंद ने बताया – कचौरी के साथ चटनी और कढ़ी तो सभी सर्व करते हैं। लेकिन पूरण जी की कचौरी दही के साथ सर्व होती है। इसके पीछे की कहानी है कि जब कचौरी बनाते हैं तो इसमें बहुत सारी काली मिर्च, और लौंग का इस्तेमाल होता है। इन मसालों की तासीर गर्म होती है। तासीर को मैनेज करने के लिए दही के साथ देना शुरू किया। यह कॉन्सेप्ट लोगों को बहुत पसंद आया। आज कोई भी व्यक्ति जब आता है तो वह दही कचौरी हमसे मांगता है। एकदम ताजा दही हम खुद ही तैयार करते हैं। जेली हींग और कुटे हुए मसालों का इस्तेमाल ओनर गोविंद ने बताया बरसों पुराना स्वाद बरकरार रहे इसलिए कारीगर से लेकर तेल-मसालों के वेंडर आजतक नहीं बदले। जिस दुकान से सालों पहले किराने का सामान, कुटे हुए मसाले आते थे, आज भी हम वहीं से लाते हैं। कचौरी की भरावन में घर पर कुटे हुए मसाले इस्तेमाल करते हैं। मसालों में हींग का तड़का ही कचौरी के स्वाद को अलग बनाता है। हींग के पाउडर की जगह जेली फॉर्म (साबुत हींग) में आने वाली स्पेशल हींग डालते हैं। कारीगर सोहनलाल ने बताया कि असली हींग की पहचान है कि उसे पानी में डालने के बाद दूध के कलर जैसा सफेद हो जाए। हम जो हींग इस्तेमाल करते हैं वो भी वैसा ही होता है। पुराने शहर के लोग हींग की कचौरी वालों के नाम से हमें आज भी जानते हैं। गली के कॉर्नर पर एसबीआई बैंक है, पहले यहां कोचिंग सेंटर भी हुआ करता था। मसालों की खुशबू ऐसी होती है कि गली के बाहर बैठे लोगों को पता लग जाता है कि पूरण जी के यहां कचौरी बनना शुरू हो गई है। फिर चाहे वह बैंककर्मी हो या कोचिंग में पढ़ने वाला स्टूडेंट सभी दुकान की ओर पहले से आकर खड़े हो जाते हैं। आगे बढ़ने से पहले देते चलिए आसान से सवाल का जवाब ग्राहक बोले- सालों से बरकरार है स्वाद एक ग्राहक गौरव ने बताया कि वे 10वीं क्लास में यहां पास ही कोचिंग करने आते थे, बसे लगातार दही कचौरी का स्वाद चख रहे हैं। स्थानीय निवासी अतुल पारीक ने बताया- मैं पिछले 20 साल से यहां की कचौरी का स्वाद चख रहा हूं। स्कूल टाइम से दही कचौरी का जो टेस्ट था वैसा आज भी है। पिछले राजस्थानी जायका में पूछे गए प्रश्न का सही उत्तर सही जवाब है, नसीराबाद की लाल चाट। 70 साल पुराना यह जायका लोगों के बीच जुकाम-बुखार ठीक करने वाली चाट के नाम से फेमस है। आज से करीब 70 साल पहले नवल चंद हलवाई ने ब्रेड और लाल रंग की चटनी के कॉम्बिनेशन से इस चाट को बनाया था। कहते हैं इस तरह की चाट प्रदेश में कहीं और नहीं मिलती। (CLICK कर पढ़ें)

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