वह तीर्थ जहां भगवान महावीर के कानों में ठोकी कीलें:यहां पत्थरों पर पैरों की निशान की पूजा; दुनियाभर से आते हैं लाखों श्रद्धालु

महावीर जयंती के पावन मौके पर हम आपको राजस्थान के चमत्कारी और प्रसिद्ध जैन मंदिर और तीर्थ क्षेत्र के वर्चुअल दर्शन करा रहे हैं। राजस्थान में सिरोही जिले में स्थित बामनवाड़जी जैन मंदिर वो स्थान है जहां महावीर स्वामी ने अपने कानों में कीलें ठोके जाने का दर्द महसूस किया। भगवान महावीर ने इस क्षेत्र में विचरण किया था। मान्यता है कि उनके पैरों के निशान आज भी इस क्षेत्र में हैं। जिनकी पूजा करने दुनियाभर से लाखों लोग यहां आते हैं। सिरोही शहर से लगभग 16 किलोमीटर दूर पिंडवाड़ा रोड पर स्थित है बामनवाड़जी जैन मंदिर। तस्वीरों में देखें मंदिर के अद्भुत नजारे… 27 मूर्तियों में दिखते हैं अलग-अलग भाव यह पवित्र तीर्थ एक पहाड़ी पर विशाल परिसर में फैला हुआ है। आसपास जंगल और हरी-भरी पर्वतमालाएं इस क्षेत्र को शांत, सौम्य और आस्था से आलोकित करती हैं। भव्य मुख्य द्वार पर हाथियों की मूर्तियां तीर्थ-यात्रियों का स्वागत करती हैं। तीर्थ क्षेत्र में भगवान महावीर की संगमरमर निर्मित 27 मूर्तियों में अलग-अलग भाव नजर आते हैं। ये बहुत ही खूबसूरत प्रतिमाएं हैं। इन प्रतिमाओं में सांसारिक मोह से मुक्ति का आनंदित भाव नजर आता है। मूल नायक तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की पद्मासन मुद्रा में विराजित लाल रंग की प्रतिमा आखों को असीम सुख का अनुभव कराती है। मान्यता- यहां भगवान महावीर ने किया था विचरण मान्यता है कि भगवान महावीर ने इस क्षेत्र में विचरण किया था। यह श्वेतांबर जैन श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख तीर्थ है। इस पहाड़ी पर वर्ष 1292 में जैन तीर्थ क्षेत्र होने का पहला शिलालेख मिला। ऐसे और भी अवशेष मिले हैं जो काफी पुराने हैं। करीब 46 साल पहले 1979 में इस तीर्थ क्षेत्र का बड़े पैमाने पर जीर्णोद्धार किया गया। इस तीर्थ की पहचान जीवित स्वामी के रूप में है। क्योंकि भगवान महावीर स्वामी ने यहां प्रवास किया था और कानों में धकेली गई कीलों के दर्द का सामना किया था। इसीलिए इस पवित्र स्थल को ‘जीवित स्वामी’ के नाम से जाना जाता है। यहां शिलाओं पर उत्कीर्ण भगवान महावीर स्वामी के पैरों के निशान की पूजा करने बड़ी तादाद में श्रद्धालु आते हैं। राजा संप्रति ने लिया था तीर्थ यात्रा का संकल्प ऐसी मान्यता है कि राजा संप्रति ने वर्ष में चार बार तीर्थ यात्रा पर जाने का संकल्प लिया था। इन 5 तीर्थों में से एक बामनवाड़जी तीर्थस्थल भी शामिल था। ऐसे तथ्य मिलते हैं कि विक्रमी संवत 821 में सामंत शाह ने इस तीर्थ का जीर्णोद्धार कराया। इसके बाद कई बार यह तीर्थ पुनर्निर्मित हो चुका है। बामनवाड़जी जैन तीर्थ क्षेत्र में यात्रियों के लिए धर्मशाला, अतिथि गृह और भोजनशाला समेत अन्य सुविधाएं सहज उपलब्ध हैं। कैसे पहुंचें बामनवाड़जी जैन मंदिर नजदीकी एयरपोर्ट उदयपुर से यह क्षेत्र 117 किलोमीटर, हिल स्टेशन माउंट आबू से 67 और अहमदाबाद (गुजरात) से 252 किमी की दूरी पर है। जबकि पिंडवाड़ा रेलवे स्टेशन (सिरोही) से दूरी महज 10 किलोमीटर है। ऐसे में यहां तक सड़क, वायु और रेल परिवहन के जरिए आसानी से पहुंचा जा सकता है। जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म ईसा से 599 साल पहले वैशाली के क्षत्रिय कुंड में हुआ। आज यह क्षेत्र बिहार राज्य में आता है। राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के पुत्र वर्धमान ने 30 साल की उम्र में सांसारिक जीवन त्यागा और संन्यास के रास्ते पर चल पड़े। उन्होंने समाज को जीने का सही तरीका समझाने के लिए कुछ सिद्धांत दिए। इनमें 5 प्रमुख सिद्धांत हैं-अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह यानी भोग की वस्तुओं का त्याग करना, अस्तेय यानी चोरी नहीं करना और ब्रह्मचर्य यानी इंद्रियों को अपने वश में करना। उनकी शिक्षाओं ने दुनियाभर में लाखों लोगों को प्रेरित किया। 486 ईसा पूर्व नालंदा बिहार के पावापुरी में उनका देवलोक गमन हुआ। पढ़ें राजस्थान के अन्य जैन मंदिरों का रोचक इतिहास… पश्चिम भारत का सबसे पुराना जीवित जिनालय:यहां मिट्टी-दूध से निर्मित हैं भगवान महावीर, हर 2 साल में सोने का लेप; रिटायर्ड जज अजूबा बता चुके गाय के दूध से निकली थी भगवान महावीर की प्रतिमा:आज भी ग्वालों के वंशज के बगैर नहीं निकलती है रथ यात्रा, शिखर पर सोने के कलश​​​​​​​ दुनिया में सिर्फ यहां मूंछों वाले भगवान महावीर स्वामी:चमत्कार देख महाराणा कुंभा हो गए थे नतमस्तक, सुबह-शाम बदल जाता है चेहरे का भाव​​​​​​​

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