थोड़ी-थोड़ी देर में कुछ भी भूल जाना, डिमेंशिया, किसी भी बात को समझने और सोचने में कठिनाई… इस तरह के लक्षण किसी में दिखाई दे तो तो हो सकता है वह पार्किंसंस बीमारी का शिकार हो गया है। कुछ साल पहले तक यह बीमारी 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को होती थी। लेकिन नए रिसर्च में पता चला है कि अब इस बीमारी का शिकार 25 से 35 साल के युवा भी हो रहे हैं। राजधानी समेत राज्यभर में इस बीमारी के मरीज बढ़ते ही जा रहे हैं। इस बीमारी के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 11 अप्रैल को वर्ल्ड पार्किंसंस डे भी मनाया जा रहा है। डीकेएस के विशेषज्ञ डॉ. अभिजीत कोहाट ने बताया कि पार्किंसंस एक न्यूरोडीजनरेटिव डिसीज है। जो मुख्य रूप से नर्वस सिस्टम को टारगेट करती है। इसके लक्षण अक्सर शरीर के एक तरफ या एक अंग से ही शुरू होते हैं। धीरे-धीरे यह बीमारी पूरे शरीर में फैलने लगती है। ऐसे मरीजों को नींद जल्दी नहीं आती है। मरीज जकड़न और कंपकंपी का अनुभव करने लगते हैं। उनकी चाल धीमी हो जाती है। वे कुछ ऐसी हरकतें करते हैं जिस पर उनका खुद नियंत्रण नहीं होता। उन्हें चलने में भी परेशानी होती है। ऐसे में जल्द से जल्द उन्हें इलाज की आवश्यकता होती है। चौंकाने वाली बात है कि केवल डीकेएस अस्पताल में ही हर साल 300 से 400 मरीजों में इस बीमारी के लक्षण के नजर आते हैं। इनमें हर 10 में 3 मरीज इस बीमारी से ग्रसित होते हैं। यही वजह है कि अब एम्स और डीकेएस में हर गुरुवार को पार्किंसंस क्लीनिक भी लगाया जा रहा है। इससे बचने के लिए योग, एरोबिक्स, स्ट्रेचिंग आदि व्यायाम नियमित करते रहना चाहिए। रिसर्च में आया यह बीमारी अनुवांशिकी
डॉक्टरों के अनुसार ब्रेन में डोपामाइन रसायन की कमी से यह बीमारी होती है। उम्र के साथ बीमारी बढ़ने लगती है। डॉक्टरों ने बताया कि युवाओं में इसका कारण अनुवांशिकी होता है। उनमें यह विकार जेनेटिक आता है। इसके कारण उनके ब्रेन में भी डोपामाइन नामक न्यूरो ट्रांसमीटर की कमी हो जाती है। फिर मरीजों में धीमी चाल, कंपकंपी, चलने में परेशानी आदि समस्या आती है। वहीं जब मरीज एडवांस स्टेज में होता है तो वह सोचने, याद रखने और निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है। उनमें मेंटल हेल्थ डिसऑर्डर, पागलपन, नींद आदि की समस्या होने लगती है।


