एसएमएस के बर्न आईसीयू के बाहर से रिपोर्ट:बतौर मेडिकल रिपोर्टर पहली बार ऐसा बर्न केस, लिवर तक बाहर दिख रहा था

अलसुबह एसएमएस में लगातार एंबुलेंस का शोर सबको चौंका रहा था। मुझे तो पता था कि अजमेर रोड अग्निकांड के घायल-मृतकों को लाया जा रहा है। सूचना मिल चुकी थी कि हादसा भयंकर है। मैं एसएमएस के बर्न आईसीयू के बाहर इंतजार कर रहा था। अचानक शोर हुआ, हटो-हटो… देखा तो एक स्ट्रेचर पर जले हुए व्यक्ति को लाया जा रहा था। पास आते घायल को जैसे ही देखा तो सिहरन दौड़ गई। जैसे करंट लगा हो। दिल दहल उठा। धड़कन गले तक चढ़ आई। पूरे शरीर पर चमड़ी ही नहीं थी। घाव ऐसे थे कि लिवर भी बाहर निकल रहा था। पिछले 16 सालों में मेडिकल रिपोर्टिंग करते हुए कई पोस्टमार्टम, ऑपरेशन, एक्सीडेंट और घायलों को देखा, लेकिन पहली बार ऐसा वीभत्स मंजर देख मैं कांप उठा। मां की लाइन याद आ गई- सब को जलकर जमीन में मिल जाना है मगर ये क्या? जिंदा जलना। फिर से कांप उठा मैं। एक-दो और फिर लगातार आने वाले घायलों से एक घंटे के अंदर ही बर्न आईसीयू पूरा भर गया। झुलसे शरीरों से चमड़ी लटक रही थी और अंदरुनी अंग बाहर तक निकल रहे थे। तन को कपड़ा कैसे छुएगा, यह सोच कर ही सिहरन होने लगी। शायद ही कोई ऐसा था, जिसके शरीर पर पूरी खाल भी बची हो। वह पूरी तरह जल चुकी थी और शरीर काले पड़ चुके थे। एक-एक घायल पर दो से तीन डॉक्टर और स्टाफ जुटा हुआ था। दर्द कम करने के इंजेक्शन, दवाएं दी गईं। पीड़ितों को पट्टियां बांधी गईं, आंखें ही दिख रही थीं। डॉक्टर्स यह समझ नहीं पा रहे थे कि ट्रेकेस्ट्रॉमी (सांस लेने के लिए गले में लगाया जाने वाला उपकरण) भी कैसे लगाया जाए। करीब 11:20 बजे आईसीयू में मौत की पहली खबर आई। खबर के लिए यह महज एक संख्या थी मगर बाहर बैठे परिजनों के लिए जीने-मरने का सवाल। बाहर बैठे सैंकड़ों परिजन रोने लगे। पता ही नहीं था कि किसका अपना अब नहीं रहा। दिन ढलने के हर पहर के साथ जिंदगियां कम होती रहीं और रात तक 12 बजे तक 12 जानें जा चुकी थीं। मैं भी खबर लिखते हुए दुआ कर रहा था कि अब बस, कोई ऐसी खबर ना आए।

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