सुप्रीम कोर्ट ने तलाक और गुजारा भत्ते के मामलों में महिलाओं द्वारा कानून के दुरुपयोग पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह प्रावधान पतियों को दंडित करने या संपत्ति वसूलने का जरिया नहीं हो सकते। जस्टिस बीवी नागरत्ना और पंकज मिथल की बेंच ने यह फैसला रिंकू बहेती बनाम संदीश शारदा मामले में सुनाया। कोर्ट ने कहा कि केवल पति के उच्च जीवन स्तर के आधार पर गुजारा भत्ता मांगना अनुचित है। कोर्ट ने तलाकशुदा पत्नी को भोपाल का मकान दो महीने में खाली करने का आदेश दिया। इसके साथ ही पति को पत्नी को 12 करोड़ रुपये गुजारा भत्ता और 3 लाख रुपए मुकदमेबाजी खर्च एक महीने में देने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट के ऑन रिकॉर्ड एडवोकेट प्रियांक उपाध्याय के अनुसार ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक मुद्दों को लेकर ऐसी टिप्पणी की हो, इससे पहले भी वैवाहिक विवादों से संबंधित अधिकांश शिकायतों में दुष्कर्म, आपराधिक धमकी और विवाहित महिला से क्रूरता करने सहित भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं को लगाने के लिए शीर्ष अदालत ने फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट शिवाली शर्मा उपाध्याय मानती हैं कि यह फैसला उन पुरुषों के लिए बेहद राहत भरा है, जो अकारण ही इन कानून की आड़ मे महिलाओं की नाजायज मांग का शिकार हो रहे हैं। आपराधिक कानून के प्रावधान महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तीकरण के लिए हैं लेकिन कभी-कभी कुछ महिलाएं इनका इस्तेमाल ऐसे उद्देश्यों के लिए करती हैं, जिनके लिए वे कभी नहीं होते।


