धमतरी में पहली बार अखाड़ा प्रतियोगिता:बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने दिखाए 20 से ज्यादा करतब, लुप्त होती परंपरा को बचाने का प्रयास

छत्तीसगढ़ के धमतरी में हनुमान जन्मोत्सव के अवसर पर पहली बार अखाड़ा प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता में छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने हिस्सा लिया। सभी प्रतिभागियों ने अपने शानदार करतब दिखाए। कार्यक्रम में 20 से अधिक विभिन्न प्रकार के करतब प्रस्तुत किए गए। आस-पास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग इस अखाड़ा प्रतियोगिता को देखने पहुंचे। यह आयोजन लुप्त होती परंपरा को पुनर्जीवित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। जानकारों का मानना है कि अखाड़े की गतिविधियों में युवाओं की भागीदारी से उन्हें नशे से दूर रखने में मदद मिल सकती है। इस तरह के आयोजन न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देते हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को भी संरक्षित करते हैं। धमतरी के मकई चौक में पहली बार हुआ अखाड़ा प्रतियोगिता मकई चौक में पहली बार अखाड़ा प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस आयोजन की पहल क्रीड़ा भारती धमतरी द्वारा की गई, जिसका उद्देश्य वर्षों से लुप्त हो रही पारंपरिक अखाड़ा विधा को पुनर्जीवित करना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना था। कार्यक्रम में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और लाठी-पट्ठा, भुनाटी, चाक डंडी, चरखप्पा, तराजू, गूस, आदि पारंपरिक युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया। आत्मरक्षा और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ यह आयोजन नशा मुक्ति का संदेश भी लेकर आया। पुरानी परंपराएं फिर से जीवित होंगी कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ नागरिकों और प्रतिभागियों ने बताया कि बीते वर्षों में गांव-गांव और शहर के प्रत्येक वार्ड में अखाड़ा शाखाएं होती थीं, जहाँ युवा पीढ़ी को आत्मरक्षा के गुर सिखाए जाते थे। इन अखाड़ों से नशे से दूर रहने, अनुशासन और आत्मबल को बढ़ाने का प्रशिक्षण मिलता था। प्रतिभागियों ने खुशी जताई कि अब धमतरी में इस परंपरा की पुनः शुरुआत हो रही है। उनका मानना है कि अगर आज के युवा अखाड़ा की ओर लौटें, तो वे बुरी आदतों से बच सकते हैं और स्वस्थ जीवनशैली अपना सकते हैं। गांव-शहर के अखाड़ों की भागीदारी क्रीड़ा भारती धमतरी के लक्ष्मण साहू ने बताया कि इस आयोजन में भोथली, बलियार, झिरिया और सांकरा गांवों के अखाड़ों की सक्रिय भागीदारी रही। उनका कहना है कि एक समय था जब किसानों के बेटे गांव-गांव अखाड़ों से जुड़ते थे, और शारीरिक व मानसिक रूप से मजबूत बनते थे। अब क्रीड़ा भारती इस पारंपरिक शारीरिक विद्या को बड़े स्तर पर पुनर्जीवित करने का कार्य करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले वर्षों में शहर और गांव को जोड़ते हुए अखाड़ा प्रतियोगिताओं का और अधिक भव्य आयोजन किया जाएगा।

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