कम नंबरों से नहीं टूटा हौसला:CBSE 10वीं में 78% लाने वाले युवक ने खड़ी की करोड़ों की कंपनी, माता-पिता को दिखाई अपनी काबिलियत

सफलता सिर्फ अंकों से नहीं नापी जाती। महाराष्ट्र के सिन्नर गांव के रोहित उगले ने साबित कर दिया। साल 2001 में जन्मे रोहित ने CBSE 10वीं बोर्ड में 78% अंक हासिल किए। उनके माता-पिता को 90% की उम्मीद थी। परिणाम के बाद घर का माहौल तनावपूर्ण हो गया। रोहित को डर था कि परिवार वाले उनके नंबरों को लेकर क्या कहेंगे। वह चाहते थे कि कोई उनसे रिजल्ट के बारे में न पूछे। रोहित ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा येवला के SND इंग्लिश मीडियम स्कूल से की। 10वीं की बोर्ड परीक्षा उन्होंने सिन्नर के नवजीवन डे स्कूल से दी। कम नंबर आने के बाद रोहित ने हार नहीं मानी। उन्होंने इस निराशा को अपनी ताकत में बदल दिया। रोहित ने ठान लिया कि वह अपने माता-पिता को अपनी काबिलियत साबित करके दिखाएंगे। आज वह एक सफल उद्यमी हैं। उनकी कंपनी का कारोबार करोड़ों रुपए का है। रोहित की कहानी साबित करती है कि अगर आपके अंदर कुछ कर दिखाने का जज्बा हो, तो कोई भी चुनौती आपको सफलता से नहीं रोक सकती। उनकी सफलता की कहानी युवाओं के लिए प्रेरणा है कि परीक्षा में कम अंक आने का मतलब जीवन में असफलता नहीं होता। “कुछ अलग करने की चाहत…” धीरे-धीरे रोहित का ध्यान डिजिटल दुनिया की ओर आकर्षित हुआ। उन्होंने स्वयं ही यूट्यूब और इंटरनेट के माध्यम से डिजिटल मार्केटिंग की बारीकियां सीखना शुरू कर दिया। इसके बाद, उन्होंने फ्रीलांसिंग करना आरंभ किया, जिसमें वे वेबसाइटें बनाते और छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स पर काम करते थे। उन्होंने दिन-रात मेहनत की और नए कौशल सीखते रहे। इसी दौरान, उनकी रुचि कोडिंग और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में विकसित हुई। उन्होंने बिना किसी औपचारिक संस्थान या पाठ्यक्रम के PHP और Java जैसी प्रोग्रामिंग भाषाएं सीखीं। साल 2017 में, मात्र 16 वर्ष की आयु में, रोहित ने अपनी कंपनी सैटमैट टैक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की। एक छोटे से कमरे से शुरू हुई यह कंपनी आज 100 से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान कर रही है। साल 2021 में, रोहित की असाधारण मेहनत और उद्यमशीलता को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली, जब उन्हें अभिनेता और समाजसेवी सोनू सूद के द्वारा सर्वश्रेष्ठ आईटी स्टार्टअप कंपनी का पुरस्कार प्रदान किया। यह पुरस्कार न केवल एक सम्मान था, बल्कि उस डर से शुरू हुई एक युवा की असाधारण यात्रा की जीत का प्रतीक भी था।

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