प्रभु, मैं आपके चरण धोए बिना नाव में नहीं बैठने दूंगा

श्री बांके बिहारी कथा समिति, हैबोवाल कलां की ओर से न्यू पटेल नगर स्थित संतोष धर्मशाला में चल रही श्रीराम कथा के छठे दिन मंगलवार को कथा व्यास आचार्य राजन कृष्ण महाराज (वृंदावन) ने राम वनवास और केवट मिलन का मार्मिक प्रसंग सुनाकर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। उन्होंने कहा कि माता-पिता और गुरु के वचन भगवान के समान होते हैं, बिना विचार किए उनका पालन करना चाहिए। कथा के प्रारंभ में उन्होंने श्रीराम के स्वयंवर का वर्णन किया। बताया कि जब श्रीराम ने शिवधनुष तोड़कर सीता संग विवाह किया तो राजा जनक ने अपनी तीन अन्य पुत्रियों का विवाह लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न से कराया। उस युग में बारातें कई-कई महीनों तक रहती थीं। राजा दशरथ ने तीन माह बाद विदाई की इच्छा जताई, पर जनक ने आग्रह किया कि कुछ दिन और रुकें। वशिष्ठ मुनि के समझाने पर विदाई दी गई। अयोध्या लौटने पर चारों राजकुमारों और उनकी पत्नियों का भव्य स्वागत हुआ। राजा जनक ने विदाई के समय अपनी पुत्रियों को उपदेश दिया कि ससुराल में सास-ससुर की सेवा माता-पिता की तरह करनी चाहिए। गुरु व माता-पिता की वाणी को बिना विचार किए पालन करना चाहिए। जीवन को चंद्रमा की तरह शीतल और अनमोल धरोहर समझकर जीना चाहिए। ऐसा करने से संसार में यश और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। आचार्य राजन ने आगे राम राज्याभिषेक की तैयारियों, मंथरा के भड़काने पर कैकेयी द्वारा दो वरदान मांगने, भरत को राजगद्दी और राम को 14 वर्ष के वनवास देने का वर्णन किया। वनवास के दौरान राम केवट से मिलते हैं। केवट विनम्रता से कहता है प्रभु, मैं आपके चरण धोए बिना नाव में नहीं बैठने दूंगा। पत्थर पर पैर रखते ही अहिल्या को जीवन मिल गया, मेरी नाव भी स्त्रीवत है, यदि यह भी तर गई तो मेरा धंधा क्या बचेगा? राम मुस्कराए और केवट को गले लगाकर कहा तुमने सेवा का जो भाव दिखाया, वह अनमोल है। प्रसंग सुनकर उपस्थित श्रद्धालु आंखें नम कर बैठे। भजन मंडल ने तेरी नैया पार करेंगे कृष्ण कन्हैया… भजन से माहौल भक्तिरस में सराबोर कर दिया। आरती के साथ कथा का समापन हुआ।

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