नामधारी सिखों ने रविवार को एसजीपीसी मुख्यालय पहुंचकर जत्थेदारों की नियुक्ति व सेवा मुक्ति को लेकर अपने सुझाव दिए। गुरु ठाकुर दलीप सिंह जी के आदेशानुसार लिखित रूप में अपने सुझाव एसजीपीसी प्रधान हरजिंदर सिंह धामी जी को पेश किए गए हैं। नामधारी पंथ के मुख्य प्रबंधक अमरीक सिंह ने कहा कि गुरु साहिब ने अकाल तख्त साहिब का एक जत्थेदार नियुक्त करने की कोई प्रथा कभी भी नहीं चलाई। गुरु जी ने पांच प्यारे नियुक्त किए, पंच प्रधान की प्रथा चलाई। इसलिए एक जत्थेदार की जगह विद्वानों, अनुभवी गुरसिखों की पंचायत अकाल तख्त साहिब से पंथ का प्रबंधन संभालने के लिए होनी चाहिए। एक जत्थेदार नहीं चाहिए। अकाल तख्त साहिब का एक जत्थेदार नियुक्त करना गुरु जी की पंच प्रधान वाली प्रथा का प्रत्यक्ष विरोध है। तख्तों के प्रबंध के लिए भले ही एक जत्थेदार के पद के बजाय पांच विद्वानों की पंचायत होनी चाहिए। परन्तु यदि आप एक जत्थेदार का पद जरूरी रखना ही चाहें, तो उसके साथ बड़े अनुभवी सलाहकारों का मंत्रिमंडल भी होना जरूरी चाहिए। यह नहीं कि चार गुरुद्वारों के ग्रंथी सिंहों की सलाह लेकर या उन्हें अपने साथ सहमत करके, जत्थेदार कोई बड़ा निर्णय ले लें। तख्तों के जत्थेदारों की नियुक्तिया पंथ के सभी गुरु नानक नाम लेवा संप्रदायों की सहमति से होनी चाहिए। अकाल तख्त साहिब पर दमदमी टकसाल की सहमति से ही सिंह साहिबान लगने जरूरी हैं। ऐसी संस्थाओं द्वारा तैयार किए हुए जत्थेदार ही लगने चाहिए; मिशनरी सोच वाले जत्थेदार नहीं लगने चाहिए। क्योंकि, वह परंपरागत सिख धर्म के श्रद्धा वाले सिद्धांतों को नहीं मानते, उल्टा उसके विरुद्ध प्रचार करते हैं। शिरोमणि कमेटी को तख्तों के जत्थेदारों को अपने कर्मचारी नहीं समझना चाहिए, बल्कि एक सम्मानित हस्ती मानना चाहिए। बहुत अच्छी बात होगी, यदि तख्तों के जत्थेदार शिरोमणि कमेटी से कोई वेतन न लें और पुरातन परंपरा के अनुसार निस्वार्थ होकर सेवा करें।


