जमशेदपुर | सांस्कृतिक कार्य निदेशालय तथा पथ पीपुल्स एसोसिएशन फॉर थियेटर के संयुक्त तत्वावधान में चल रही 21 दिवसीय निःशुल्क नाट्य कार्यशाला के दसवें दिन लेखक जयनंदन एवं संजय मिश्रा ने साथ सीधा संवाद स्थापित किया। जयनंदन ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि सृजन तभी सच्चा होता है जब वह परिवेश परिस्थिति और जोख़िम को आत्मसात कर कार्य करता है। मैंने गांवों के किसानों, मजदूरों, स्त्रियों और हाशिए के लोगों की पीड़ा को मंच पर लाने का प्रयास किया है। जब एक पुरुष कलाकार स्त्री पात्र को आत्मसात करता है, तो वह सिर्फ अभिनय नहीं करता, बल्कि वह उस पात्र के जीवन को जीता है। यही अभिनय की आत्मा है। संजय मिश्र ने रंगमंच की सामाजिक भूमिका और समकालीन चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा आज जब टेलीविजन, ओटीटी सिनेमा के माध्यमों ने गति पकड़ी है, तब रंगमंच की िजम्मेदारी और भी बढ़ गई है।


