भास्कर न्यूज | जांजगीर-सक्ती अविभाजित मध्यप्रदेश में दो बार मंत्री रहे राजा सुरेंद्र बहादुर सिंह 83 वर्ष का मंगलवार को निधन हो गया। उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत काफी दिलचस्प रही। आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा और विधानसभा चुनाव दोनों में हार गई थी और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी अपनी सीट नहीं बचा पाई थी, तब ऐसे समय सुरेंद्र बहादुर सिंह सक्ती विधानसभा से चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने। भारत में छठी लोकसभा के सदस्यों का चुनाव करने के लिए 16 से 20 मार्च 1977 के बीच आम चुनाव हुए। चुनाव आपातकाल के दौरान हुए, जो अंतिम परिणाम घोषित होने से कुछ समय पहले 21 मार्च 1977 को समाप्त हो गया। चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आर) को भारी हार का सामना करना पड़ा। जिसमें मौजूदा प्रधानमंत्री और आईएनसी (आर) पार्टी की नेता इंदिरा गांधी रायबरेली में अपनी सीट हार गई थी। जबकि उनके बेटे संजय अमेठी में अपनी सीट हार गए थे। इसी प्रकार अक्टूबर 1977 में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी ने अधिकांश सीटें जीतीं और जनता पार्टी के कैलाश चंद्र जोशी मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। ऐसे समय में भी सक्ती विधानसभा से उन्हांेने जीत दर्ज की और विधायक के रूप में चुने गए। 1865 में 14 रियासतों का गठन हुआ था। उस समय सक्ती छोटी रियासत थी। उस समय बड़ी रियासत बस्तर थी। सक्ती रियासत के सबसे पहले राजा हरि गुजर हुए। इनके पुत्र रूपनारायण सिंह ने गद्दी 1914 में निधन होते तक सम्हाली थी। वर्ष 1950 से परिवार का राजनीति में रहा दबदबा परिवार की राजनीतिक करियर की बात करें तो पूरे भारत की राजनीति में किसी राज परिवार ने निरंतर 5 दशकों (50 वर्षों) तक अपना प्रतिनिधित्व रखा है। परिवार के सदस्य निरंतर सन 1952 से पांच दशकों तक सक्ती विधानसभा क्षेत्र में विधायक के रूप में सत्तासीन रहे । इस दौरान सक्ती रियासत के 1952 से राजा लीलाधर सिंह, राजमाता टंक राजेश्वरी सिंह, कुमार पुष्पेंद्र बहादुर सिंह, इंदुमती के बाद राजा सुरेंद्र बहादुर सिंह भी चार बार विधायक और दो बार मंत्री रहे।


