भास्कर न्यूज | जालंधर हवा और पानी में बढ़ते प्रदूषण का असर हमारे बच्चों की सेहत पर सीधा असर दिखा रहा है। इसके चलते बच्चे अस्थमा के शिकार हो रहे हैं। शहर में करीब 100 बाल रोग विशेषज्ञ हैं। चिकित्सकों के अनुसार ओपीडी में 2 से 4 फीसदी केस अस्थमा के आ रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार 20 साल पहले अस्थमा से ग्रस्त बच्चे कभी-कभार ही ओपीडी में आते थे। अब अस्थमा बच्चे को चपेट में ले रहा है। इसकी वजह बदलती जीवन शैली है। अस्थमा एक दीर्घकालिक (क्रोनिक) फेफड़ों की बीमारी है, जब अस्थमा होता है, तो आप फेफड़ों में हवा नहीं ले पाते हैं। इसकी वजह है कि वायुमार्ग सूज जाते हैं। इससे सांस लेना मुश्किल हो जाता है, अगर अस्थमा को अच्छी तरह से नियंत्रित नहीं किया जाता है, तो यह कई तरह की समस्याओं का कारण बन सकता है। यहां तक कि बच्चे को अस्पताल में भी भर्ती करना पड़ सकता है। इस संबंध में बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. एमएस भूटानी ने कहा कि बदलती जीवन शैली में कम उम्र के बच्चे भी अस्थमा की चपेट में आ रहे हैं। इसकी वजह है कि एयर और वाटर पॉल्यूशन का बढ़ना भी बच्चे के सेहत को प्रभावित करता है। बच्चे की जांच करते डॉ. भूटानी। खांसी, घबराहट, उल्टी आना, फीवर, सांस लेने में तकलीफ, भूख कम लगना और सांस तेज लेना शामिल हैं। वैसे अस्थमा रोग से ग्रस्त मरीज को प्यास भी लगती है। इससे बचाव के लिए अस्थमा से ग्रस्त बच्चे को गर्मी में डाइट का ध्यान देना चाहिए। इसमें ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक, आइसक्रीम, खटाई, फास्ट फूड आदि खाद पदार्थों के सेवन से बचाव करना चाहिए। वहीं, बंद कमरे में नियमित धूम्रपान से परहेज करना चाहिए। ^सिविल अस्पताल के बाल रोग विभाग की ओपीडी में रोज 150 बच्चे इलाज के लिए आते हैं। यहां पर रोज पांच से सात बच्चे अस्थमा से ग्रस्त पहुंच रहे हैं। सर्दी और खेतों में पराली जलाने पर भी ओपीडी में अस्थमा के मरीज बढ़ जाते हैं। बच्चों की सेहत पर अभिभावकों को नजर रखनी चाहिए।’ -डॉ. ऋषि मारकंडा, बाल रोग विशेषज्ञ


