शुक्ल मंत्रिमण्डल में पत्नी बनीं कैबिनेट मंत्री, पति बने उपमंत्री:राज परिवारों को अपने पक्ष में करने के लिए कांग्रेस ने उनमें से कई को टिकट दिए

आजादी मिलने के बाद पहली बार लोकतांत्रिक आधार पर चुनाव 1952 में हुए। वैसे तो तत्कालीन मध्यप्रदेश में कांग्रेस का जनाधार मजबूत था लेकिन राज्य में 15 देसी रियासतों को मध्यप्रदेश में मिला लिया गया था जहां कांग्रेस उतनी मजबूत नहीं थी। इन 15 देसी रियासतों में से 14 रियासतें छत्तीसगढ़ क्षेत्र की थीं। कांग्रेस ने एक रणनीति के तहत इन रियासतों के राज परिवारों को अपने पक्ष में करने के लिए पहले आम चुनाव में उनमें से कई को टिकिट दिया। इस तरह तत्कालीन मध्यप्रदेश विधानसभा में छत्तीसगढ़ क्षेत्र से कांग्रेस से जीतकर आने वालों में धरमजयगढ़ से चंद्रचूण प्रसाद सिंहदेव, घरघोड़ा से ललित कुमार सिंह, सारंगढ़ से नरेश चंद्र सिंह, राजिम से श्याम कुमारी देवी और खैरागढ़ से वीरेन्द्रबहादुर सिंह तथा बोरीदेवकर से पद्मावती देवी शामिल थे। इनके अतिरिक्त, रामराज्य परिषद् से जीतकर विधायक बनने वालो में जशपुर से विजयभूषण सिंहदेव, पंडरिया से पद्राज सिंह और कवर्धा से गंगाप्रसाद सिंह शामिल थे। उस समय मध्यप्रदेश की राजधानी नागपुर में थी। पं. रविशंकर शुक्ल बने मुख्यमंत्री
पहले चुनाव के बाद पंडित रविशंकर शुक्ल मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। सन् 1956 में नया राज्य बनने के बाद अन्य क्षेत्रों के नेताओं की जबरदस्त कोशिशों के बावजूद पंडित रविशंकर शुक्ल ही मुख्यमंत्री बने। नए मंत्रिमण्डल में शुक्ल जी ने बहुत सोच विचार के साथ मध्यभारत, विंध्यप्रदेश और भोपाल के शीर्ष नेताओं को अपने मंत्रिमण्डल में शामिल किया। इस मंत्रिमण्डल की एक सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि देसी रियासतों के क्षेत्र से चुने गए विधायकों में से, शुक्ल जी ने केवल सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह, खैरागढ़ रियासत के राजा वीरेन्द्रबहादुर सिंह और खैरागढ़ की रानी पद्मावती देवी को अपने मंत्रिमण्डल में शामिल किया। नये मध्यप्रदेश में बदले समीकरण
यह संयोग की बात है कि 1952 में मध्यप्रदेश की विधानसभा के लिए चुनाव हो जाने के बाद 1956 में भाषावार प्रांत रचना के आधार पर नया मध्यप्रदेश बना जिसकी राजधानी भोपाल में बनी। नया मध्यप्रदेश बनने पर मध्यभारत, भोपाल और विंध्यप्रदेश की रियासतों का प्रभाव राजनीति पर कहीं गहरे से पड़ने लगा, विशेषकर ग्वालियर राजघराने का हस्तक्षेप बहुत अधिक हो गया। खैरागढ़ में शुरू हुआ संगीत विश्वविद्यालय
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस मंत्रिमण्डल में रानी पद्मावती को लोक स्वास्थ्य विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाया गया था और उनके पति राजा वीरेन्द्रबहादुर सिंह को शिक्षा एवं सामान्य प्रशासन विभाग का उपमंत्री बनाया गया था। बहरहाल, रेखांकन योग्य बात यह है कि राजा वीरेन्द्रबहादुर सिंह 1952 के बाद चुने नहीं गए। हां, परिसीमन में बोरीदेवकर विधानसभा का विलोपन होने के कारण, रानी पद्मावती 1957 में वीरेन्द्रनगर से निर्विरोध विधायक चुनीं गईं। इसके बाद 1962 में वे फिर वीरेन्द्रनगर से विधायक चुनीं गई। 1967 में रानी पद्मावती राजनांदगांव से सांसद चुनी गईं। रानी पद्मावती विधायक बनने के पहले खैरागढ़ जनपद पंचायत की अध्यक्ष रही थीं। उन्हें एक और श्रेय प्राप्त है- अपनी बेटी इंदिरा के नाम पर खैरागढ़ में इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय की 1956 में स्थापना करना।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *