डीएमसीएच अस्पताल में 34 वर्षीय गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहे बच्चे को खून चढ़ाकर उसकी जान बचाई गई। इस मेडिकल प्रक्रिया को इंट्रायूट्रिन ब्लड ट्रांसफ्यूजन कहा जाता है, जिसमें अल्ट्रासाउंड की मदद से सुई के जरिये गर्भ में ही भ्रूण को खून दिया जाता है। यह पंजाब में पहली बार हुआ है और इसे गर्भावस्था के दौरान गंभीर एनीमिया से जूझ रहे भ्रूण के लिए जीवनरक्षक कदम माना गया है। महिला की पिछली प्रेग्नेंसी में आठवें महीने में बच्चा गर्भ में ही मर गया था। इस बार डॉक्टरों ने शुरुआती जांच में आईसीटी टेस्ट पॉजिटिव पाया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि मां के खून में बनने वाली एंटीबॉडीज बच्चे के खून पर हमला कर रही हैं। अल्ट्रासाउंड डॉपलर में भ्रूण में खून की भारी कमी पाई गई। ऐसे में डॉक्टरों की टीम ने तय किया कि बच्चे को गर्भ में ही खून चढ़ाया जाए। यह तकनीक उन महिलाओं के लिए वरदान साबित हो सकती है जिनकी पिछली प्रेगनेंसी खराब रही है। इससे पहले ऐसी तकनीक नहीं थी और बच्चे को जन्म के बाद ही ब्लड चढ़ाया जाता था, जिसमें रिस्क ज्यादा होता था। अब गर्भ में ही खून देकर न केवल भ्रूण की जान बचाई जा सकती है, बल्कि उसका विकास भी सामान्य किया जा सकता है। गर्भ में नस ढूंढना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है, इसमें ओ-नेगेटिव खून का इस्तेमाल होता 10 मिनट में प्रक्रिया पूरी हो जाती है : इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट डॉ. सुशांत बब्बर ने बताया कि यह प्रक्रिया अल्ट्रासाउंड मार्गदर्शन में की जाती है, जिसमें पेट के जरिए बच्चे की बहुत बारीक नस में सुई डालकर खून चढ़ाना होता है। यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है, पर जब समय पर किया जाए तो गर्भावस्था की दिशा ही बदल सकती है। इस प्रक्रिया में ओ-नेगेटिव खून का इस्तेमाल होता है, ताकि किसी प्रकार की प्रतिक्रिया न हो। मात्र 10 मिनट में पूरी हो जाने वाली इस प्रक्रिया ने बच्चे का हेमेटोक्रिट 36 से बढ़ाकर 45 कर दिया। 28वें हफ्ते में पता चला था खतरा: गायनी विभाग की प्रमुख डॉ. आशिमा तनेजा ने बताया कि आरएच नेगेटिव मां और आरएच पॉजिटिव पिता की संतान में यह समस्या ज्यादा होती है। इस केस में महिला की हिस्ट्री पहले से खराब थी, इसलिए आईसीटी टेस्ट किया जो पॉजिटिव निकला। फिर डॉपलर से भ्रूण में खून की कमी देखी गई। समय रहते खून चढ़ाया गया जिससे बच्चा 32वें हफ्ते तक सुरक्षित पहुंच गया। पहले उसका वजन 1100 ग्राम था जो अब 1820 ग्राम हो गया है। जन्म से पहले ब्लड देना जरूरी: बाल रोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. कमल अरोड़ा ने कहा कि अगर भ्रूण में खून की कमी हो और समय रहते इलाज न मिले, तो जन्म के बाद बच्चे की जान बचाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे बच्चों में दिल की धड़कन असामान्य हो जाती है और शरीर में पानी भरने लगता है। इस प्रक्रिया से ऐसे खतरों से बचाव हुआ। भ्रूण का वजन भी बढ़ रहा है और अगर दो किलो तक पहुंचता है तो मानसिक और शारीरिक विकास भी बेहतर रहेगा।


