उत्तर-पूर्वी राज्य अरुणाचल प्रदेश पर चीन के दावे के बावजूद सीमा के पास बसे थेम्बांग गांव के लोग इसे भारत की ओर से यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थल की स्थायी सूची में शामिल कराने को लेकर उत्साहित हैं। दो दिन पहले चीन ने 27 स्थानों के चीनी और तिब्बती नाम प्रकाशित कर अरुणाचल प्रदेश पर दावा किया था, जिसका भारत ने कड़ा प्रतिवाद किया था। चीन की चालबाजी के उलट गांव के लोग सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक स्तर पर ले जाने की तैयारियों में जुटे हैं। इसी हफ्ते एक सम्मेलन में दिरांग विधायक फुरपा त्सेरिंग ने परामर्श समिति से उन तमाम मानदंडों पर काम करने को कहा, जिससे थेम्बांक को धरोहर स्थल का टैग जल्द हासिल हो सके। गांव के लोगों का कहना है कि चीन हमारे इलाकों पर दावा करता रहा है लेकिन यह भारत की भूमि है। हम मातृभूमि की रक्षा के लिए जान दे सकते हैं। भारत सरकार ने 2 अप्रैल 2018 को एक जानकारी प्रकाशित कर बताया था कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में 6 स्मारकों/ऐतिहासिक स्थलों को विश्व धरोहर स्थल के अंतर्गत अस्थायी रूप से चिह्नित किया गया है। इनमें अरुणाचल का थेम्बांग गांव भी है। 56 साल के एन. ल्हामू (बदला नाम) ने बताया कि चीन हमारे राज्य में जगहों के नाम बदलने की बचकानी हरकत पहले भी करता रहा है, लेकिन इससे गांव वालों को फर्क नहीं पड़ता। हम भारतीय हैं और अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग था, है और हमेशा रहेगा। हम देश के अन्य लोगों की तरह निडर होकर सामान्य जीवन जी रहे हैं। विधायक फुर्पा त्सेरिंग ने यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की अंतिम अस्थायी सूची में थेम्बांग गांव के शामिल होने के संदर्भ में कहा कि अरुणाचल के लिए यह गौरव का क्षण है। कैसा है थेम्बांग 2014 में यूनेस्को ने जीरो घाटी के साथ थेम्बांग को विश्व धरोहर स्थल के लिए नामित किया था। राज्य सरकार 2015 में इसे राज्य धरोहर स्थल घोषित कर किया। 3.2 एकड़ में फैला किलाबंद गांव मोनपा जनजाति के द्रिकिपा कबीले का घर है। गांव की 254 लोग रहते हैं। यह पश्चिम कामेंग जिले में पड़ता है। गांव से 32 किमी दूर चीन की आर्मी तैनात है।


