जैकेट अमूमन चमड़े और सिंथेटिक फैब्रिक से बनाए जाते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के एक छोटे से गांव बहेराडीह के किसान स्कूल में पौधों की पत्तियां, डंठल और रेशों से जैकेट बना रहे हैं। अमारी, चेंच भाजी, भिंडी के डंठल, केले के छिलके और अलसी जैसे पौधों से बने ये जैकेट न सिर्फ जैविक हैं, बल्कि गर्मी में ठंडक और सर्दी में गर्मी का अहसास भी कराते हैं। इनकी मांग अब देश ही नहीं, विदेशों में भी हो रही है। यही नहीं, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक भी इस अनोखे नवाचार को देखने बहेराडीह पहुंच चुके हैं। उन्हें यह इतना पसंद आया कि उन्होंने सभी प्रकार के जैकेट की खरीदी की। जांजगीर-चांपा जिले के अंतिम छोर के गांव बहेराडीह की पहचान अब देश में ही नहीं विदेशों में भी होने लगी है। पेड़-पौधों के रेशे से बन रहे जैकेट से इसकी पहचान बढ़ी है। यहां के किसान दीनदयाल यादव ने पहले तो 36 प्रकार की स्थानीय भाजियों और धान का पेटेंट कराया। फिर अमारी और चेंच भाजी और केले के छिलके, अलसी के ठंडल से रेशा निकालकर लैब में टेस्ट कराया और इससे जैकेट बनाने का काम शुरू किया। जैकेट बनाने का काम बुनकर रामाधार देवांगन अपने हाथों से खुद करते हैं। वैसे तो किसान दीनदयाल 2010-11 से सब्जियों पर नई खोज कर रहे हैं, लेकिन 23 दिसंबर 2021 को उन्होंने किसान स्कूल की शुरुआत की। 2022 में इस स्कूल को जांजगीर क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार स्व. कुंजबिहारी साहू किसान स्कूल नाम दिया गया। इनके काम को देखते हुए रेशम बोर्ड ने आसपास की महिलाओं को जैकेट बनाने के लिए ट्रेनिंग का जिम्मा किसान स्कूल को सौंपा है। करीब 30 महिलाओं को किसान स्कूल में ट्रेनिंग दी जा रही है। इन्हें मेहनताना रेशम बोर्ड द्वारा दिया जा रहा है।


