हाईकोर्ट ने कहा पारदर्शी बैग से दोष तय नहीं होता:कोर्ट ने कहा – दोनों की बातें सोच पर टिकी, दूसरी जमानत याचिका खारिज

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ इस वजह से कि नशीला पदार्थ पारदर्शी (ट्रांसपेरेंट) बैग में मिला, यह मान लेना गलत है कि पुलिस ने खुद उसे रखकर किसी को फंसाया है। अदालत ने NDPS एक्ट के एक मामले में यह अहम टिप्पणी करते हुए आरोपी धर्मिंदर सिंह उर्फ टुंडा की दूसरी जमानत याचिका खारिज कर दी। यह फैसला NDPS एक्ट की धारा 22 (C) के तहत दर्ज केस में आया है। न्यायमूर्ति अनिल कंवलजीत सिंह बत्रा ने कहा कि अगर कोई यह तर्क दे कि कोई समझदार व्यक्ति पारदर्शी बैग में नशा नहीं रखेगा क्योंकि वह आसानी से दिख जाएगा, तो यही बात पुलिस पर भी लागू होती है। अगर पुलिस किसी को झूठा फंसाना चाहती, तो वह भी नशा छिपाने के लिए पारदर्शी बैग की बजाय अपारदर्शी या छिपे हुए तरीके का इस्तेमाल करती। पारदर्शी बैग से तो खुद पुलिस पर शक होता। दोनों पक्षों की दलीलें अनुमान पर आधारित कोर्ट ने कहा कि आरोपी धर्मिंदर सिंह उर्फ टुंडा के पास पारदर्शी बैग में नशा मिलना यह साबित नहीं करता कि वह बेकसूर है या पुलिस ने जानबूझकर उसे फंसाया है। आरोपी खुद यह दावा नहीं कर सकता कि वह इतना लापरवाह है कि साफ दिखने वाले बैग में नशा रखेगा, और न ही पुलिस को इतना बेवकूफ कहा जा सकता है कि वह झूठा केस बनाने के लिए ऐसा तरीका अपनाए जो आसानी से पकड़ा जाए। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में दोनों ही बातें—आरोपी ने खुद नशा रखा या पुलिस ने जबरन रख दिया—सिर्फ अटकलें हैं और इनमें से किसी को भी सच्चाई मानकर जमानत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी के पास से जो नशा बरामद हुआ है वह ‘व्यवसायिक मात्रा’ में है, और ऐसा कोई सबूत नहीं है कि आरोपी ने अपराध नहीं किया या आगे दोबारा नहीं करेगा। इसलिए आरोपी की दूसरी जमानत याचिका खारिज की जाती है।

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