जीईएल चर्च की स्थापना 2 नवंबर 1845 में हुई। तब से लेकर 155 साल तक चर्च में केवल पुरुष पादरियों ने ही सेवा दी। पहली बार 26 अक्टूबर 2000 में 3 महिलाओं ने जीईएल चर्च में पादरी के रूप में दीक्षा ली। उनकी धर्मविधि मेन रोड स्थित क्राइस्ट चर्च में पूरी की गई थी। इसमें पादरी आशीषन कंडुलना ने महिला सचिव, पादरी मेरियन मिंज ने बेथेसदा ग्रेजुएट कॉलेज इंचार्ज और पादरी इजाबेला बारला ने गोविंदपुर में प्रचारक ट्रेनिंग के रूप में शुरुआती सेवा दी। इन तीन महिला पादरियों में से पादरी मेरियन मिंज की मृत्यु हो चुकी है। गोस्सनर थियोलॉजिकल कॉलेज में 70 के दशक में पहली बार महिलाओं के लिए प्रवेश आमंत्रित किए गए थे। उस समय मेरियन मिंज ने सबसे पहले एडमिशन लिया। लेकिन 4 साल के बाद ही 1974 में महिलाओं के लिए इसे बंद कर दिया गया। साल 1992 में फिर से कॉलेज में महिलाओं के लिए प्रवेश आमंत्रित किए गए। महिला सशक्तिकरण, ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर कर रही हैं काम महिला पादरी साउथ ईस्ट डायसिस-खूंटी, साउथ वेस्ट डायसिस-ओडिशा, मध्य डायसिस-सिमडेगा, नॉर्थ ईस्ट डायसिस-असम, नॉर्थ वेस्ट डायसिस, हेडक्वार्टर कांग्रीगेशन-रांची में काम कर रही हैं। महिला पादरी चर्च में आराधना की अगुवाई के अलावा चर्च अॉफिस में भी अपनी सेवा दे रही हैं। ज्वलंत मुद्दों पर काम करती हैं, महिला सशक्तीकरण, जस्टिस, ह्यूमन ट्रैफिकिंग, जागरूकता पर काम किए जाते हैं। रुढ़िवादी मानसिकता के कारण महिला को पादरी नहीं बनाते थे पादरी आशीषन कंडुलना ने बताया कि उन्होंने 1993-97 तक गोस्सनर थियोलॉजिकल कॉलेज में पढ़ाई की। इसके बाद बैचलर अॉफ डिबनिटी गुरुकुल लूथरान थियोलॉजिकल कॉलेज चेन्नई से पूरी की। एक महिला पुरोहित होकर कलीसिया में सेवा देना चाहती थी। चर्च में उस दौरान महिला पादरी नहीं थी। आशीषन कंडुलना ने साल 2000-2018 तक सचिव के पद पर काम किया। वर्तमान में एचआरडीसी में प्रोजेक्ट अॉफिसर और मिशन सुपरिटेंडेंट के तौर पर सेवा दे रही हैं। उन्होंने बताया कि शुरुआत के दिनों में कठिनाई आई। आज राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिलाएं चर्च से जुड़कर काम कर रही हैं। वर्तमान में स्थिति में काफी सुधार हुआ है। महिलाओं को भी चर्च में सेवा देने की स्वतंत्रता दी गई। पहले रुढ़िवादी मानसिकता के कारण महिला पादरियों को लोग स्वीकार नहीं कर पाते थे। मेरे बड़े भाई ने कॉलेज में एडमिशन लेने के लिए मुझसे कहा। विषम परिस्थतियों में काम करना पड़ा। ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा परेशानी आती थी। अभी 45 महिला पादरी चर्च में दे रही हैं सेवा: सचिव शशि रीता कंडुलना ने बताया कि कॉलेज के बनने के बाद चर्च में लगभग 45 महिला पादरी सेवा दे रही हैं। 50 पास्टर कैंडिडेट है और वर्तमान में कॉलेज में 15 महिलाएं शिक्षा ले रही हैं। थियोलॉजिकल कॉलेज में भी महिला पादरी शिक्षिका के तौर पर सेवा दे रही हैं। बिशप बनने के लिए 50 वर्ष की उम्र सीमा होनी चाहिए। भविष्य में महिला पादरी भी बिशप बन सकती हैं। महिला पादरी आशीषन कंडुलना, मेरियन मिंज व इजाबेला बारला (फाइल फोटो)।


