झिरिया का पानी पीकर लोग बीमार:कई गांवों में 2 गुंडी पानी में गुजारा कर रहे परिवार

छत्तीसगढ़ में लोगों को पीने का साफ पानी देने के लिए 80 हजार करोड़ रुपए से अधिक की योजनाएं चलाई जा रही हैं। इन योजनाओं को प्रदेश के हर गांव तक लागू किया गया है, बावजूद इसके छत्तीसगढ़ में जलसंकट की स्थिति है। ये स्थिति राजधानी से महज 20 किमी दूर बन चुकी है। वहां कई गांवों में दो-तीन किमी दूर से पानी लाना पड़ रहा है। जलसंकट का सामना कर रहे पठारीडीह गांव में भास्कर टीम पहुंची, तो हकीकत सामने आई। पठारीडीह गांव: उरला-सिलतरा के पास शहर से लगा पठारीडीह गांव। आबादी 1375। पानी के लिए पूरे गांव में एक मात्र बोर। हर परिवार को हर दिन औसतन दो गुंडी पानी। इसी को पीना और निस्तारी करना। गांव के ओंकार निषाद, अनूप निषाद, राजेंद्र ने बताया कि हालात यह हो गए हैं कि नई पीढ़ी पढ़ने-लिखने शहर जाती है तो लौटकर ही नहीं आना चाहती। कई लड़कों की शादी इस कारण से नहीं हो रही है कि गांव में पानी नहीं है। शादी के बाद शहर या दूसरे गांव में ब्याही गई बेटियां गर्मी के दिनों में गांव नहीं आतीं। लड़के गांव से बाहर ही अपना घर बसाने लगे हैं। गांव के लोग पास के तालाब मे नहाने जाते हैं। यहां पानी इतना खराब हे, क्योंकि गांव की एक फैक्ट्री का एसिड जमीन में रिसकर तालाब के पानी में मिल रहा है। एसिड वाले इस पानी में नहाने से दिनभर खुजली और जलन महसूस होती है। दैनिक भास्कर की टीम सुबह 5.30 बजे गांव पहुंची। गुंडी, बाल्टी, गंजी, टब लेकर महिलाएं, छोटे बच्चे आने लगे थे। पानी लेने पहुंची गांव की महिला कुमारी बाई ने बताया कि पूरे गांव के पानी में एसिड है। दाल बनाओ तो गलती नहीं, गंजी में पानी भरकर रखने पर पूरा बर्तन लाल हो जाता है। यह दशा एक-दो साल नहीं बल्कि पिछले एक दशक से है। कुछेक बोर में साफ पानी है, लेकिन वह गर्मी में सूख जाते हैं। पुराने पठारीडीह का यही एकमात्र बोर चालू है। उसी से सबकी निस्तारी हो रही है। गांव में पानी की बहुत समस्या है। एकमात्र बोर पर पूरा गांव निर्भर है। बमुश्किल पीने लायक पानी मिल पाता है। गांव में एक दशक पहले एक फैक्ट्री आशुतोष इंजीनियर खुली। यहां फर्नेस का काम होता है। फैक्ट्री का एसिड जमीन के पानी में मिल गया है। इसलिए पूरे गांव में जमीन के नीचे पानी प्रदूषित हो गया है। इसकी शिकायत प्रशासन से की गई। सुशासन तिहार में भी आवेदन दिया गया। आज तक फैक्ट्री बंद नहीं की गई। जलजीवन मिशन की टंकी बनी है, लेकिन चार साल से चालू नहीं हुई है। हर घर के आगे नल है, लेकिन सिर्फ दिखावे के लिए। -सावित्री तेजराम निषाद, सरपंच पठारीडीह बिलासपुर: झिरिया का पानी पी रहे बैगा आदिवासी, पेट में होता है दर्द पर पीना मजबूरी
छपरापारा की 70 वर्षीय बजरहीन बैगा को अब इस बात का भरोसा नहीं है कि उसके गांव में शुद्ध पानी मिलेगा। बिछाई गई पाइप लाइन से भी उनके मन में उम्मीद नहीं जगी। वह बताते हैं कि जब से शादी होकर गांव आई है, हर गर्मी झिरिया का पानी पीना पड़ता है। जल संकट तो हर गर्मी में लेकिन पहली बार ऐसी स्थिति है जब अप्रैल खत्म होने के पहले गांव का एकमात्र कुआं सूख गया। हैंडपंप से बदबूदार पानी आ रहा है, इसे पी नहीं सकते। ऐसे में झिरिया का पानी कपड़े से छानकर पीते हैं। 65 साल की चैतीन बैगा हो या फिर जीत सिंग बैगा, सभी भयानक जल संकट से जूझ रहे हैं। अब तक इनकी सुध लेने कोई नहीं पहुंचा है। बिलासपुर जिले में तखतपुर, बिल्हा और मस्तूरी के ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी की समस्या शुरू हो चुकी है लेकिन कोटा तहसील के आदिवासी गांवों में गर्मी की शुरूआत के साथ ही जलसंकट ने पाव पसार दिए हैं। कुआं और हैंडपंप या तो सूख चुके हैं, या इतना कम पानी निकल रहा है कि ग्रामीणों को झिरिया का पानी पीना पड़ रहा है। जिला मुख्यालय से 80 किमी दूर मोहली ग्राम पंचायत के आश्रित गांव छपरापारा और बगबूड़ की हालत सबसे खराब है। यहां पीने के लिए बूंदभर पानी भी नहीं है।

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