फाइल और खास तोहफा लेकर दिल्ली गए थे CM:बोधघाट-प्रोजेक्ट पर PM की सहमति, 269 गांवों को मिलेगा फायदा, बिजली-प्रोजेक्ट और नक्सलवाद पर भी चर्चा

छत्तीसगढ़ के CM विष्णुदेव साय ने शुक्रवार को दिल्ली में PM मोदी से मुलाकात की। इस दौरान CM साय के हाथ में फाइल और खास तोहफा था। साय ने PM से 45 साल से अटके बोधघाट प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए मदद की मांग की। इस पर PM मोदी ने सहमति दे दी है। प्रोजेक्ट में 22 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च होंगे। बोधघाट सिंचाई परियोजना से दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा जिले के 269 गांवों को फायदा पहुंचेगा। इससे बस्तर की सालाना कमाई 6 हजार 223 करोड़ हो सकती है। इसके साथ ही CM ने इंद्रावती-महानदी इंटरलिंकिंग परियोजना की भी जानकारी दी। इन दोनों प्रोजेक्ट पर करीब 49 हजार करोड़ रुपए खर्च हो सकते हैं। वहीं CM साय ने नक्सल ऑपरेशन भी की जानकारी दी। PM ने मांगों पर सहमति जताई है। CM साय ने PM मोदी से 13 दिनों में 2 बार मुलाकात की। दोनों बार बस्तर पर ज्यादा बातचीत हुई। इस दौरान CM ने PM मोदी को बस्तर के बेलमेटल से तैयार नंदी की मूर्ति तोहफे में दिया। PM मोदी ने अरे वाह कहकर तोहफे को स्वीकार किया। अब जानिए मीटिंग में क्या-क्या बातचीत हुई ? CM साय शनिवार को दिल्ली से रायपुर लौटे। इस दौरान उन्होंने बताया कि PM मोदी से बोधघाट सिंचाई परियोजना और इंद्रावती-महानदी इंटरलिंकिंग परियोजना के बारे में बातचीत हुई। बस्तर संभाग के विकास के लिए दोनों प्रोजेक्ट महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने बताया कि बस्तर लंबे समय तक नक्सल प्रभावित रहा है। सिंचाई क्षमता बढ़ाने के लिए यहां काम नहीं हो पाया है। बस्तर में बुवाई वाले क्षेत्र 8.15 लाख हेक्टेयर में से केवल 1.36 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही सिंचाई सुविधाएं विकसित हो पाई है। दावा- बस्तर को बदल देगा ये प्रोजेक्ट बोधघाट परियोजना से बस्तर में बड़े बदलाव आने वाले हैं। दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर में सिंचाई का रकबा प्रत्येक जिले में 60 प्रतिशत से अधिक बढ़ जाएगा। राज्य के सिंचाई रकबे में 4 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। प्रोजेक्ट से बस्तर की 72% कृषि योग्य भूमि को कवर करना है परियोजना से पशुपालन, मछलीपालन, पर्यटन और परिवहन में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। साथ ही औद्योगिक क्षेत्र को दिए जाए जाने पानी, पेयजल, पर्यटन से समेत अन्य स्रोतों से 6 हजार 223 करोड़ की सालाना आय होने का अनुमान है। 300 मेगावाट (MW) जल बिजली उत्पादन होने की संभावना है। बोधघाट प्रोजेक्ट 40 साल से ज्यादा पुराना बोधघाट परियोजना को करीब 45 साल पूरे हो चुके हैं। केंद्र सरकार ने जनवरी 1979 में बोधघाट परियोजना और आंध्रप्रदेश की पोलावरम परियोजना को मंजूरी दी थी। पोलावरम का काम 75 प्रतिशत पूरा हो चुका है, जबकि बोधघाट की नींव में एक पत्थर तक नहीं रखा गया है। वाप्कोस ने सर्वे पूरा कर सरकार को रिपोर्ट सौंपी केंद्रीय एजेंसी वाप्कोस ने सर्वे शुरू किया, जो पूरा हो गया। राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपी जा चुकी है। उस समय यह क्षेत्र अविभाजित मध्य प्रदेश के अंतर्गत आता था। यह कार्य इसलिए शुरू नहीं हो सका, क्योंकि तत्कालीन सरकार का मानना ​​था कि परियोजना बस्तर के आदिवासी बहुल लोगों के लिए उपयुक्त नहीं है। उधर, केंद्र सरकार ने हाइड्रोलॉजी रिपोर्ट को ओके कर दिया है। अब डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) पर काम जारी है। अब प्रधानमंत्री से CM की इस प्रोजेक्ट को लेकर हुई खास मीटिंग को नई शुरुआत माना जा सकता है। जानिए प्रोजेक्ट में रुकावट की वजह पर्यावरणविदों को छत्तीसगढ़ सरकार के सर्वेक्षण और इंद्रावती नदी पर बोधघाट परियोजना के निर्माण पर आपत्ति है। कार्यकर्ता आदिवासी समुदायों के विस्थापन के मुद्दे उठा रहे हैं। विचार यह है कि आदिवासी लोगों को अपनी जमीन न खोनी पड़े। इसके अलावा 5010 हेक्टेयर निजी भूमि और 3068 हेक्टेयर सरकारी भूमि भी जलमग्न हो जाएगी। वनों को नुकसान उठाना पड़ेगा। इस परियोजना से इंद्रावती टाइगर रिजर्व, भैरमगढ़ जंगली भैंसा अभयारण्य और भारतीय जंगली भैंसों के अन्य आसपास के आवासों की पारिस्थितिकी भी प्रभावित होगी। मछलियां भी प्रभावित होती हैं, क्योंकि बांध मछलियों को भोजन और प्रजनन स्थलों के बीच प्राकृतिक मार्गों पर आगे बढ़ने से रोकते हैं।

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