एम्स भोपाल:पहली बार 7 साल की बच्ची का बोन मैरो ट्रांसप्लांट, कीमो से मुक्ति

ब्लड कैंसर से जूझ रही एक 7 साल की बच्ची का एम्स भोपाल में पहली बार बोन मैरो ट्रांसप्लांट हुआ। यह हेप्लो-आइडेंटिकल(स्टेम सेल के अधूरे मिलान वाला) बोन मैरो ट्रांसप्लांट है। स्टेम सेल डोनर के रूप में बच्ची के भाई को चुना गया। भाई का एचएलए (ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन) आधा मेल खाता था, जो हेप्लो-आइडेंटिकल ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त पाया गया। दरअसल, इस तरह के ट्रांसप्लांट में आमतौर पर भाई-बहनों से 25% तक मैच मिलने की संभावना होती है। माता-पिता के साथ मेल खाने की संभावना बेहद कम होती है। इस बच्ची के भाई का 10/12 एचएलए मैच पाया गया, यही कारण है कि उसे डोनर के रूप में चुना गया। इसके बाद बच्ची के परिवार वालों को इस ट्रांसप्लांट के बारे में बताकर काउंसिलिंग की गई। संक्रमण से बचाने के लिए मरीज को आइसोलेशन में रखा गया
चिकित्सा ऑन्कोलॉजी और हीमेटोलॉजी विभाग के डॉ. गौरव ढींगरा और डॉ. सचिन बंसल ने इस ट्रांसप्लांट को अंजाम दिया। इसमें पहले से दूसरे सप्ताह तक मरीज और डोनर की गहन जांच की गई। जिसमें एचएलए मिलान, ब्लड टेस्ट और अन्य चिकित्सा परीक्षण शामिल हैं। मरीज को संक्रमण से बचाने के लिए आइसोलेशन में रखा गया। इसके बाद 5 से 7 दिन कंडीशनिंग थेरेपी यानी मरीज को माइलो-अब्लेटिव कंडीशनिंग रेजिमेन दी गई। इसमें कीमोथेरेपी और टोटल बॉडी इरैडिएशन (रेडियोथेरेपी) शामिल होती है। इसका उद्देश्य मरीज के असामान्य बोन मैरो को खत्म करना होता है। इसके बाद ट्रांसप्लांट किया जाता है। ट्रांसप्लांट के बाद नई कोशिकाएं बनना शुरू डोनर से स्टेम सेल लेकर मरीज के शरीर में इंजेक्ट करने में एक दिन लगा। बच्ची के शरीर में ट्रांसप्लांट के बाद मरीज के बोन मैरो ने नई कोशिकाएं बनाना शुरू कर दिया है और उसकी ब्लड काउंट रिकवरी हो चुकी है। अब उसकी साइक्लोस्पोरिन दवा के स्तर को स्थिर किया जा रहा है। जल्द ही उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी। खास बात यह है कि उसे अब किसी भी प्रकार की कीमोथेरेपी नहीं दी जाएगी। हालांकि रिकवरी के बाद सावधानी बरतनी होगी। मरीज को संक्रमण व अन्य जटिलताओं से बचाने के लिए अस्पताल में निगरानी में रखा गया है। शुरुआत में मरीज का इम्यून सिस्टम बहुत कमजोर होता है। मरीज को एक साल तक रूटीन फॉलोअप में रखा जाएगा। दिल्ली के बाद ऐसा करने वाला भोपाल एम्स दूसरा बच्ची का इलाज एम्स भोपाल के बाल्य ऑन्कोलॉजी विभाग में डॉ. नरेंद्र चौधरी की देखरेख में हो रहा था। मरीज को माइलो-अब्लेटिव कंडीशनिंग रेजिमेन के तहत संपूर्ण शरीर की रेडियोथेरेपी (टोटल बॉडी इरैडिएशन) दी गई, जिसे रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के डॉ. सैकत दास, डॉ. विपिन खराडे और भौतिक विज्ञानी (आरएसओ) अवनीश मिश्रा ने संचालित किया। बच्चों में रक्त कैंसर के लिए ऐसी उन्नत बोन मैरो ट्रांसप्लांट सुविधा प्रदान करने वाला एम्स दिल्ली के बाद यह दूसरा एम्स बन गया है।
ट्रांसप्लांट हमारी बड़ी उपलब्धि है
हेप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट जैसी जटिल प्रक्रियाओं को सफलतापूर्वक पूरा करना हमारे संस्थान की टीम की विशेषज्ञता और समर्पण को दर्शाता है। यह एम्स भोपाल के लिए बड़ी उपलब्धि है। इस उपलब्धि से एम्स भोपाल ने बच्चों के ब्लड कैंसर के उपचार में एक नई दिशा स्थापित की है।
डॉ. अजय सिंह, डायरेक्टर, एम्स भोपाल

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