छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ जिले में स्थित कमल विलास पैलेस का प्राचीन राधा-कृष्ण मंदिर अब आम जनता के लिए खोल दिया गया है। इस मंदिर को लगभग 50 साल पहले आभूषणों की चोरी के बाद बंद कर दिया गया था। मंदिर में काले पत्थर से निर्मित श्रीकृष्ण और सफेद संगमरमर की राधा रानी की प्रतिमा स्थापित हैं। इतिहास में इस मंदिर को ‘टॉकिंग गॉड’ के रूप में जाना जाता था। ऐसी कहा जाता है कि खैरागढ़ रियासत के राजा कठिन निर्णयों के समय यहां प्रार्थना करते थे और उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर मिल जाते थे। इस मंदिर को खोलने के पीछे इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. लवली शर्मा का प्रयास रहा है। उन्होंने मंदिर का निरीक्षण किया और विधिवत पूजा-अर्चना के बाद इसे जनता के लिए खोलने का निर्णय लिया। मंदिर का दरबार हॉल भी खुलेगा मंदिर के साथ ही परिसर में स्थित ऐतिहासिक दरबार हॉल भी अब लोगों के लिए खुला रहेगा। यह दरबार हॉल पिछले 15 सालों से बंद था। यहां की दुर्लभ चित्रकला और ऐतिहासिक वस्तुएं अब लोगों के लिए सुलभ होंगी। डॉ. शर्मा का मानना है कि ये धरोहरें केवल विश्वविद्यालय की नहीं, बल्कि पूरे समाज की संपत्ति हैं। इन स्थलों के खुलने से लोग खैरागढ़ रियासत के गौरवशाली इतिहास को करीब से जान सकेंगे। एशिया का पहला संगीत विश्वविद्यालय कमल विलास पैलेस, जो अब इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय है, खुद एक ऐतिहासिक प्रतीक है। 1956 में स्थापित यह एशिया का पहला और इकलौता संगीत और ललित कला विश्वविद्यालय है। लेकिन इसके भीतर छुपा धार्मिक और राजसी इतिहास अब पहली बार सार्वजनिक रूप से खुला है। अब न केवल श्रद्धालु भगवान के दर्शन कर सकते हैं, बल्कि छात्र और पर्यटक भी राजसी विरासत को नजदीक से महसूस कर सकते हैं। आने वाले समय में दरबार हॉल के आसपास के अन्य कमरे भी साफ-सुथरे कर आम लोगों के लिए खोले जाएंगे। खैरागढ़ का गौरवशाली इतिहास यहां के स्थानीय जानकार भागवत शरण सिंह ने बताया कि, खैरागढ़ का शुरुआत से ही गौरवशाली इतिहास रहा है। राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती ने इस महल को विश्वविद्यालय के लिए दान किया था। यह महल लगभग 1885 के आसपास का है और पहले कमल विलास पैलेस कहा जाता था। यह राजा कमल नारायण सिंह के समय का स्ट्रक्चर है। मंदिर भी तब का ही है और निश्चित तौर पर खैरागढ़ के इस गौरवशाली मंदिर का पुनः खुलना अपने आप में श्रेयस्कर है। डॉ. लवली शर्मा का यह निर्णय एक उदाहरण बन गया है कि जब नेतृत्व में दृष्टि हो और दिल में विरासत के प्रति सम्मान, तो इतिहास फिर से जी उठता है। खैरागढ़ अब न सिर्फ शिक्षा और कला का केंद्र है, बल्कि आस्था और परंपरा का नया संगम भी बन चुका है।


