लोग अंधविश्वास को मानते हैं, क्योंकि उनको उसकी मूल उत्पत्ति ही पता नहीं होती है। धर्म परंपरा नहीं सत्य के प्रति निष्ठा है, जो व्यक्ति में सुधार और समन्वय करता है, वही धर्म है। सनातन धर्म में पाखंड का कहीं कोई स्थान नहीं है। मनुष्यों के कल्याणार्थ देवताओं द्वारा सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय को लेकर धर्म स्थापित किया गया है। न तो इसका कोई आदि होता है, न अंत होता है। यह अखिल ब्रह्मांड का होता है। इसमें अंधविश्वास का कहीं कोई स्थान नहीं रहता। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में गुरुवार को यह बात कही। शंखराज के निधन पर सबने मुढ़वा लिया सिर एक ब्राह्मण थे। वे रोज शंख बजाया करते थे। एक गधा था, जब शंख बजता तो अपनी सहभागी की आवाज समझकर वह भी बोलने लगता। पंडित समझते कि यह कोई पूर्व जन्म का तपस्वी है। एक दिन वह गधा मर गया। पंडितजी को पता चला, तो बड़ी निष्ठा से उसका संस्कार किया और सिर मुढ़वा लिया। जब पंडितजी किराना लेने दुकान पर गए तो किराने वाले ने पूछा पंडित जी यह क्या हो गया? पंडितजी बोले शंखराज का देहांत हो गया, वे बड़े धर्मनिष्ठ थे। किराने वाले ने भी धार्मिक आस्था के चलते सिर मुढ़वा लिया। इसी प्रकार पूरे गांव ने सिर मुढ़वा लिया। उसी गांव के पास एक फौज प्रशिक्षण लेने आई थी। उसमें से एक सिपाही गांव में कुछ लेने आया। उसे पता चला तो उसने भी सिर मुढ़वा लिया। सैनिक को देखकर सारे सैनिकों ने सिर मुढ़वा लिया। एक अफसर आए जब उन्होंने यह सब देखा, सिर मुढ़ाने की बात को गहराई से जानने के लिए वे पंडितजी के घर गए, उन्होंने शंखराज के बारे में पूछा। सारे गांव के लोग भी वहीं खड़े थे। जब पंडितजी ने सही बात बताई कि वे गधा को शंखराज समझ रहे हैं। सारे सैनिक और गांव के लोगों के सिर शर्म से झुक गए। इस प्रकार मूल कारण जाने बिना लोग अंधविश्वास में आ जाते हैं, इसीलिए धर्म परंपरागत नहीं वरन सत्य निष्ठा है, जो सुधार और समन्वय करती है, इसे ही धर्म कहते हैं।


