प्रसेन्नजीत मिश्रा | गुड़ाबांदा गुड़ाबांदा प्रखंड में निवास करने वाले 530 सबर परिवारों में आज भी शिक्षा को लेकर संघर्ष जारी है। कुछ परिवारों में अब भी शिक्षा को लेकर उम्मीद की किरण नजर आती है, लेकिन हकीकत यह है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद भी जब रोजगार नहीं मिलता, तो वही उत्साह धीरे-धीरे मायूसी में बदल जाता है। सुदूरवर्ती सुड़गी गांव की लक्ष्मी सबर, जिसने अनुमंडल टॉपर बनकर एक समय इलाके में गौरव का प्रतीक बनी थी, आज गुमनामी की जिंदगी जी रही है। आर्थिक मजबूरियों में बकरी चराने को मजबूर लक्ष्मी, आगे पढ़ना चाहती थी, पर परिवार की आर्थिक स्थिति और सरकारी सहयोग की कमी ने उसके सपनों को रोक दिया। दूसरी ओर, मोड़ाकाटी पंचायत के कुमड़ाशोल गांव की मोगली सबर (उम्र 26) ने वर्ष 2022 में बहरागोड़ा से एमए (पोस्ट ग्रेजुएशन) किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे ना कोई सरकारी नौकरी मिली, ना ही कोई ठोस सहारा। आज वह मजदूरी कर परिवार का पेट पाल रही है। इसके साथ ही वह ‘वन बंधु परिषद’ संस्था से जुड़ कर रोजाना दो घंटे 30 बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाती है, जिससे उसे 1000 से 1400 रुपये प्रति माह मिलते हैं। मोगली बताती हैं कि मैट्रिक की पढ़ाई कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय, बहरागोड़ा से 2015 में पूरी की थी। फिर वहीं से इंटर भी किया और एमए तक पहुंच गई। लेकिन नौकरी के लिए आवेदन करते हैं तो परीक्षा केंद्र इतने दूर होते हैं कि किराया तक जुटा पाना मुश्किल होता है। सुना था कि सबर परिवार से कोई मैट्रिक पास कर ले तो सीधी नौकरी मिलती है, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। अब मोगली अपने माता-पिता – मां ठेरी सबर, पिता फोदरा सबर – और भाई की जिम्मेदारी भी संभाल रही है। वह सवाल उठाती है कि इतनी डिग्री लेकर क्या फायदा? नौकरी तो मिली नहीं, और पेट भरने के लिए मजदूरी करनी ही पड़ती है।” प्रशासन से सवाल क्या पढ़ाई सिर्फ आंकड़े बढ़ाने तक सीमित? सबर समाज के ऐसे अनेक युवाओं की स्थिति यही बताती है कि शिक्षा के बावजूद उन्हें रोजगार और सरकारी सहायता नहीं मिल पा रही है। प्रशासन और नीति-निर्माताओं को यह सोचना होगा कि जब समाज के सबसे वंचित तबके की बेटियां एमए तक की पढ़ाई कर ले रही हैं, तो उनके सपनों को उड़ान देने के लिए व्यवस्था क्यों नहीं हो रही?


