कृषि विभाग ने किसानों को शीतलहर व पाले से फसलों को होने वाले संभावित नुकसान के लिए एडवाइजरी जारी की है, ताकि किसान सतर्क रहकर फसलों की सुरक्षा कर सके। पाले के प्रभाव से पौधों की पत्तियां व फूल झुलसकर झड़ जाते है एवं पौधों की फलियों-वालियों में दाने बनते नहीं हैं या सिकुड़ जाते हैं। रबी की फसलों में फूल व बालियों के समय पाला पड़ने पर सर्वाधिक नुकसान की संभावना रहती है। फसलों को पाले से बचाने के लिए गंधक के तेजाब का 0.1 प्रतिशत अर्थात एक हजार लीटर पानी में एक लीटर सांद्र गंधक का तेजाब का घोल तैयार कर फसलों पर छिड़काव करें या घुलनशील गंधक के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव भी कर सकते हैं। नकदी सब्जी वाली फसलों में भूमि के तापमान को कम होने से बचाने के लिए फसलों को टाट, पॉलिथिन अथवा भूसे से ढक देना चाहिए। पाले के दिनों में फसलों में सिंचाई करने से भी पाले का असर कम होता है तथा पाले के स्थाई समाधान के लिए खेतों की उत्तर-पश्चिम दिशा में मेडों पर घने ऊंचे वृक्ष लगायें। कृषि अधिकारी कजोड़ मल गुर्जर ने बताया कि जब आसमान साफ हो, हवा नहीं चल रही है और तापमान काफी कम हो जाये तब पाला पडने की संभावना बढ़ जाती है। दिन के समय दोपहर में पहले ठंडी हवा चल रही हो व हवा का तापमान अत्यंत कम होने लग जाये और दोपहर बाद अचानक हवा चलना बंद हो जाए तब पाला पडने की आशंका और ज्यादा बढ जाती है। पाले के कारण पौधों की कोशिकाओं में उपस्थित जल जमने से कोशिका भित्ति फट जाती है, जिससे पौधों की पत्तियां, कोंपलें, फूल एवं फल क्षतिग्रस्त हो जाते है। इस समय किसानों को सतर्क रहकर फसलों की सुरक्षा के उपाय अपनाने चाहिये। पाला पड़ने के लक्षण सर्वप्रथम आक आदि वनस्पतियों पर दिखाई देते है। कृषि अधिकारी सूरज कंवर ने बताया कि जिस रात पाला पड़ने की संभावना हो उस रात 12 से 2 बजे के आसपास खेत के उत्तरी पश्चिमी दिशा से आने वाली ठंडी हवा की दिशा में खेतों के किनारे फसल के आसपास मेडों पर रात्रि में कूडा कचरा या अन्य व्यर्थ घास फूस जला कर धुआं करना चाहिये ताकि खेत में धुआं आ जाये एवं वातावरण में गर्मी आ जाये। सुविधा के लिए मेड पर 10 से 20 फीट के अंतर पर कूड़े-करकट पर ढेर लगाकर धुआं करें। धुआं करने के लिए अन्य पदार्थों के साथ क्रूड आयल का भी प्रयोग कर सकते हैं। इस विधि से 4 डिग्री सेल्सियस तापक्रम आसानी से बढ़ाया जा सकता है।


