आठ राज्यों में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव हो चुका है। अब झारखंड की बारी है। इसके लिए विचार परिवारों से सहमति बनाने का काम अंतिम चरण में है। लेकिन यह लगभग तय है कि इस बार संगठन बैकग्राउंड का कोई ओबीसी नेता ही प्रदेश अध्यक्ष बनेगा। अगर उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद या संघ का दायित्व निभाया हो तो ज्यादा बेहतर है। अगर किसी सांसद या विधायक ने पहले संगठन के किसी दायित्व को नहीं निभाया है तो उनका प्रदेश अध्यक्ष बनने की संभावना कम है। पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास, प्रदेश महामंत्री आदित्य प्रसाद साहू, प्रदेश महामंत्री प्रदीप वर्मा और हजारीबाग सांसद मनीष जायसवाल इस दौड़ में सबसे आगे हैं।
मनीष जायसवाल: क्षेत्र में है अच्छी पकड़ प्रदीप वर्मा: संगठन में काफी तेजी से आगे बढ़े आदित्य साहू: प्रदेश संगठन का अनुभव रघुवर दास: पहली बार 5 साल सरकार चलाई कमजोर पक्ष: प्रदेश भाजपा संगठन के किसी महत्वपूर्ण दायित्व इन्हें कभी नहीं मिला। सांगठनिक अनुभव नहीं होने के कारण पार्टी में इनका विरोध हो सकता है। सांगठनिक कार्यों से पूरे राज्य का दौरा करने का अनुभव नहीं। मजबूत पक्ष : वर्तमान में हजारीबाग के सांसद। यहां से पूर्व विधायक भी रहे। इन्हें प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी का करीबी बताया जाता है। इनके पिता बादल जायसवाल हजारीबाग जिला परिषद और नगर निगम के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं। कमजोर पक्ष: जितनी जल्दी कार्यकर्ता इनसे जुड़ते हैं, उतनी ही जल्दी विमुख भी हो जाते हैं। ओबीसी में ये जिस समाज से आते हैं, तुलनात्मक रूप से उसकी संख्या कम है। संगठन के अंदर ही एक बड़े ग्रुप के निशाने पर रहते हैं। मजबूत पक्ष :वर्तमान में राज्य सभा सदस्य और प्रदेश महामंत्री का दायित्व। संघ के कई पदाधिकारियों से रही है नजदीकी। द्वितीय वर्ष प्रशिक्षित। मैनेजमेंट में दक्ष होने के कारण पार्टी के कई कार्यक्रमों के प्रमुख रहे। कमजोर पक्ष: आगे बढ़ कर पार्टी का नेतृत्व करने में अक्सर संकोच करते हैं। सबको साथ लेकर चलने की इच्छा में सही बात नहीं रख पाते। इनका सरल स्वभाव ही इन्हें कभी-कभी कमजोर साबित कर देता है। मजबूत पक्ष: जनसंघ काल के पुराने कार्यकर्ता। राज्यसभा सदस्य और प्रदेश के महामंत्री। सरल और सहज स्वभाव के कारण कार्यकर्ताओं के बीच घुलना-मिलना आसान। प्रदेश के कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। कमजोर पक्ष: सीएम होते हुए भी विधानसभा चुनाव में अपनी सीट नहीं बचा पाए। केंद्रीय नेतृत्व नहीं चाहता था कि ये ओडिशा के राज्यपाल पद से इस्तीफा दें। पार्टी का एक धड़ा नहीं चाहता है कि ये फिर से मुख्यधारा में लौटें। मजबूत पक्ष: ये दो बार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। संगठन चलाने का अनुभव है। पूर्व मुख्यमंत्री और ओडिशा के राज्यपाल रहे हैं। झारखंड में पहली बार पांच साल तक सरकार चलाई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। ये चार नेता दौड़ में सबसे आगे : जानिए इनका मजबूत और कमजोर पक्ष


