भारतनेट परियोजना फेस-2 में बड़ा गड़बड़झाला उजागर हुआ है। 18 जुलाई 2018 को टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड (टीपीएल) को एक साल के लिए यह काम दिया गया था। जिसमें प्रदेश के 5,987 पंचायतों में फाइबर बिछाकर गांव-गांव तक इंटरनेट ले जाना था। इसके लिए केंद्र ने 2155 करोड़ और राज्य ने 112 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान रखा। चिप्स को सरकार ने नोडल एजेंसी बनाया। चिप्स ने टाटा को सितंबर 2023 तक करीब 1600 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया। टाटा का दावा था कि 5540 पंचायतों तक फाइबर पहुंचा दिया गया है। 2024 में चिप्स ने जब जांच की तो केवल 200 से भी कम पंचायतों में इंटरनेट काम करता हुआ मिला। एक साल में कई बार टाटा को नोटिस भेजा गया कि पंचायतों में इंटरनेट चालू करें, लेकिन स्थिति जस की तस बनी रही। मई 2025 में चिप्स ने टाटा का ठेका रद्द करते हुए, उसकी 167 करोड़ रुपए की जमानत राशि जब्त कर ली है। टाटा को मिले चार काम, सभी में फेल ग्राम पंचायतों में कुछ ऐसे बंधे पड़े हैं केबल के बंडल। 5,987 पंचायतों तक फाइबर लाइन बिछाएंगे।
स्थिति- आधी से अधिक पंचायतों में लाइन कट चुकी है।
हर पंचायत में राउटर लगाया जाएगा।
स्थिति- बिना मरम्मत के 30% राउटर खराब हो चुके हैं।
रायपुर में नेटवर्क ऑपरेशन सेंटर बनाना।
स्थिति- पंचायतों में इंटरनेट लाइव ही नहीं हुआ, नाम का रह गया नेटवर्क सेंटर।
सात साल तक इसकी मरम्मत का कार्य देखेंगे।
स्थिति- एक भी ग्राम पंचायत में बिछी लाइनों और राउटर के मरम्मत का कार्य नहीं किया। दैनिक भास्कर ने जानी हकीकत- जमीन में दबकर रह गए 1600 करोड़ भास्कर की टीम ने भारतनेट 2.0 में किए गए कार्यों की जमीनी हकीकत जानने के लिए 10 दिन में 50 पंचायतों का निरीक्षण किया। बस्तर से लेकर सरगुजा तक हर जगह व्यवस्था ठप मिली। पंचायतों के कमरे में भारतनेट 2.0 का कार्य कराया गया लेकिन वहां राउटर बंद मिले। कई जगहों पर तो बताया गया कि जब से राउटर लगाया गया है, एक भी बार चालू नहीं हुआ। कुल मिलाकर सरकार के 1600 करोड़ रुपए जमीन के नीचे दबकर रह गए। अब यहां प्राइवेट कंपनियों से इंटरनेट लिया जा रहा है। कुछ ऐसा हो गया है हाल अंबिकापुर जिले के ग्राम पंचायत लहपटरा के एक कमरे में लगाए सिस्टम पर धूल जमी थी। जमीन पर यूपीएस जंग खा रहे हैं। तार इधर-उधर बिखरे पड़े मिले। फाइबर के भी पांच बंडल बोरी में लपटे रखे हैं।सामान बिखरा पड़ा था। पंचायत के एक कर्मी ने बताया कि यह इंटरनेट की व्यवस्था के लिए बनाया था, लेकिन कभी चालू नहीं हुआ। पड़ताल में यह सच आया सामने
जमीन के नीचे लाइन तो बिछाई लेकिन बाद में देखभाल नहीं हुई। जल जीवन मिशन के काम के समय तार काट दिए, क्योंकि वहां कोई मौजूद नहीं था। कुछ जगहों पर तो कई मीटर तक के फाइबर तार तक को चोरी कर ले गए तो कुछ जगह जानवरों ने तार काट दिए। कहीं राउटर खराब हो गए। नक्सल क्षेत्र में नहीं लगे टावर
भारतनेट में गड़बड़झाले का सबसे बड़ा नुकसान बस्तर में हुआ। यहां फाइबर लाइन के माध्यम से बीएसएनल के करीब 100 से अधिक टावर लगाए जाने थे। लेकिन लाइन कटने से वजह से टावर नहीं लग पाए। अब यहां टावर लगाना बहुत मुश्किल हो गया है। इसके लिए बीएसएनल को पूरी लाइन खींचनी होगी। यह है योजना का उद्देश्य गांव में प्राइवेट इंटरनेट नहीं पहुंचता है। इसलिए केंद्र यह योजना लेकर आई। इस योजना के तहत ग्राम पंचायतों को नोडल सेंटर बनाया गया। हर पंचायत तक फाइबर से कनेक्शन पहुंचाए गए। इसके बाद इससे थाने, स्कूल जैसी सरकारी संस्थाओं तक कनेक्शन ले जाना था। जिससे यहां हर सरकारी काम डिजिटली हो सके। अगले फेस में महीने का शुल्क लेकर घर-घर में कनेक्शन बांटने का था। लेकिन नोडल सेंटर में ही इंटरनेट शुरू नहीं हो पाया।


