शहर का एक 18 साल का बच्चा मोबाइल की लत का ऐसा शिकार हुआ कि पिछले 6 सालों से उसने स्कूल का रास्ता ही नहीं देखा। कभी पढ़ाई में अव्वल रहने वाला ये बच्चा अब पूरे दिन कमरे में बंद मोबाइल स्क्रोल करता है, गेम खेलता है और नहाना-खाना भी भूल चुका है। माता-पिता उसकी इस हालत को देखते हैं तो खुद टूट जाते हैं लेकिन मजबूरी ये है कि अगर मोबाइल न दें तो वह खाना नहीं खाता, तोड़फोड़ करने लगता है, चिल्लाता है और खुद को कमरे में बंद कर लेता है। अब जब हालात काबू से बाहर हो गए तो माता-पिता ने बेटे को एक अस्पताल में भर्ती करवाया है। यह बच्चा कभी प्राइवेट स्कूल में पढ़ता था, छठी क्लास तक अच्छे नंबर लाता रहा, लेकिन जब से उसके हाथ में मोबाइल आया, सब बदल गया। पहले प्राइवेट स्कूल छोड़ा, फिर सरकारी स्कूल में दाखिला करवाया गया, लेकिन आठवीं के दौरान उसने स्कूल जाना ही बंद कर दिया। खुद कहता था कि मुझे कुछ नहीं आता। मोबाइल की जकड़ ऐसी हुई कि न किसी से बात करता, न घर से बाहर निकलता। दिन-रात इंटरनेट की दुनिया में खोया रहता। बच्चों का बदलता व्यवहार खतरे का संकेत मनोचिकित्सक डॉ. राघव अरोड़ा ने बताया कि रोजाना एक से दो केस मोबाइल एडिक्शन के आ रहे हैं। मोबाइल एक ऐसी चीज है, जिसका एडिक्शन बहुत तेजी से होता है और धीरे-धीरे इंसान को मानसिक, सामाजिक और शारीरिक रूप से तोड़ देता है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को केवल जरूरत के समय ही मोबाइल दें। आउटडोर एक्टिविटी करवाएं, जैसे पार्क ले जाना, फिजिकल गेम्स में हिस्सा दिलवाना। अगर घर में पेरेंट्स खुद भी हर वक्त मोबाइल में डूबे रहेंगे तो बच्चे भी वही सीखते हैं। अगर बच्चे की परफॉर्मेंस गिर रही है, वह चिड़चिड़ा हो रहा है, खेलकूद में रुचि नहीं ले रहा, या मोबाइल छीनने पर तोड़फोड़ करता है, तो यह संकेत है कि स्थिति गंभीर हो रही है। इस बच्चे की कहानी एक चेतावनी है, एक अपील भी है। एक ऐसा बच्चा जो कभी क्लास में सबसे आगे था, आज अपने ही कमरे में मोबाइल की गिरफ्त में है। यह केवल उसका नुकसान नहीं, समाज का भी नुकसान है। माता-पिता की जिम्मेदारी है कि बच्चों को तकनीक से जोड़ें, लेकिन संतुलन के साथ। प्यार, संवाद और सीमाएं, यही वो रास्ते हैं जिनसे हम अगली पीढ़ी को डिजिटल दुनिया में खोने से बचा सकते हैं। समय रहते संभल जाना ही बचाव है, वरना देर होने पर सिर्फ पछतावा रह जाता है। इलाज से जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की जद्दोजहद परिवार वालों ने कई बार मोबाइल से दूरी करवाने की कोशिश की रिचार्ज बंद करवाया, फोन तोड़ा, कमरे में बंद किया लेकिन हर बार बच्चा और ज़्यादा आक्रामक हो गया। वह अकेला बेटा है, इसलिए मां-बाप भी उसे जबरदस्ती कंट्रोल नहीं कर पा रहे थे। वह पहले बहुत समझदार था, पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन अब उसकी जिंदगी बस चार दीवारी में कैद हो चुकी है। वह हफ्तों नहाता नहीं, बालों की कटिंग नहीं करवाता, आंखों पर चश्मा लगा हुआ है और दिनभर मोबाइल में डूबा रहता है। अब अस्पताल में उसे इलाज के लिए भर्ती किया गया है, इलाज के सहारे जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की जद्दोजहद चल रही है।


