मुखिया ने 250 किलोमीटर खुद चलाई गाड़ी:अफसर को मंत्री समझकर कर दिया स्वागत; पूर्व मुखिया से सार्वजनिक रूप से बचने की मजबूरी

राष्ट्रीय स्तर के सरकारी आयोजनों में हर किसी को पहचान पाना आसान नहीं है। पिछले दिनों सीमावर्ती जिला मुख्यालय पर जीएसटी काउंसिल की बैठक में बड़ा मजमा लगा। कई राज्यों के मुखिया और खजाने वाले महकमे के मंत्री जुटे। एयरपोर्ट पर स्वागत करने के लिए कुछ अति उत्साही लोग भी पहुंच गए। एक पहाड़ी राज्य के खजाने वाले मंत्री भी बैठक में पहुंचे थे। जैसे ही वे एयरपोर्ट से बाहर गाड़ी में बैठे, स्वागत करने आए अति उत्साही लोगों से गफलत हो गई। मंत्री की जगह अफसर का स्वागत करने लगे। अफसर ने उन्हें बताया कि जिनका आप स्वागत करना चाहते हैं, वे आगे हैं। स्वागत करने वाले झेंप गए। इस तरह की गफलतों की भरमार रही। सियासत के दो रंग, पूर्व मुखिया से अकेले में मिलकर सार्वजनिक रूप से बचने की मजबूरी
सत्ता की राजनीति क्या-क्या नहीं करवाती। सियासत में कोई स्थायी समर्थक और विरोधी नहीं होता। पिछले दिनों सत्ताधारी पार्टी के एक दमदार नेताजी के यहां धार्मिक नगरी में सभी मंत्री नेता गए। प्रदेश की पूर्व मुखिया भी पहुंचीं। इस दौरान सियासी रूप से जागरूक लोगों ने सियासत के कई रंग देख लिए। पूर्व मुखिया से कई मंत्री उनकी गाड़ी रुकवा कर बीच रास्ते में ही हाथ जोड़कर मिलते देखे गए। जो मंत्री-नेता अकेले में बाहर हाथ जोड़कर मिले थे,उन्होंने कार्यक्रम में सबके सामने ऐसे दिखाया जैसे वे पूर्व मुखिया को जानते ही नहीं हों। इसे लेकर एक जागरूक नेता से रहा नहीं गया। उन्होंने मंत्रियों के बदलते सियासी रंग पर जमकर शब्दबाण चलाए। अब ये बातें छिपती तो हैं नहीं। पूर्वी राजस्थान के जिले के तबादलों को लेकर गुपचुप मैराथन होमवर्क
पूर्वी राजस्थान के चर्चित जिले में तबादलों को लेकर राजधानी में अंदरखाने मैराथन तैयारी चल रही है। उपचुनाव के बाद इस जिले से कई तरह के फीडबैक मिल रहे हैं। सत्ता वाली पार्टी के नेताओं का एक धड़ा कुछ खास कर्मचारी-अफसरों की लिस्ट तैयार कर उन्हें जिलाबदर करने की पैरवी कर चुका है। उपचुनाव से ठीक पहले तबादलों की लिस्ट पर कुछ ही देर में बाबा के नाम से मशहूर नेताजी ने वीटो लगा दिया था। अब विरोधी खेमा फिर से उन अफसर-कर्मचारियों के तबादलों की मुहिम में जुटा हुआ है। फिलहाल राजधानी में चल रही एक्सरसाइज का धरातल पर उतरने का इंतजार है। ऐसा हुआ तो इसके गहरे सियासी मायने निकलेंगे और एक नया मोर्चा भी खुल जाए तो बड़ी बात नहीं होगी। चर्चित राज्य के मुखिया की फर्राटा ड्राइविंग और पुलिस की परेशानी
पिछले दिनों सीमावर्ती जिले में हुई अहम बैठक में भाग लेने चर्चित राज्य के मुखिया भी आए। हाल ही में केंद्र शासित प्रदेश से राज्य का दर्जा मिला है। चर्चित राज्य के मुखिया ने पुलिस से लेकर प्रोटोकॉल में लगे अफसरों को खूब छकाया। चर्चित राज्य के मुखिया सीमावर्ती जिला मुख्यालय पर उतरने की जगह संभाग मुख्यालय के एयरपोर्ट पर उतरे। एयरपोर्ट पर पहले से उनके लिए लग्जरी एसयूवी डिफेंडर खड़ी थी। मुखिया खुद 250 किलोमीटर से ज्यादा ड्राइव करते हुए एयरपोर्ट से सीमावर्ती जिला मुख्यालय पहुंचे। उनकी फर्राटा ड्राइविंग स्पीड ने पुलिस एस्कॉर्ट से लेकर प्रोटोकॉल में चल रहे काफिले को पीछे छोड़ दिया। मुखिया के फर्राटा ड्राइविंग के शौक से दो दिन तक पुलिस-प्रशासन वाले परेशान से रहे। क्योंकि ड्राइविंग सीट पर बैठने के बाद उन्हें चेस करना मुमकिन नहीं है। खींचतान में अटका डायरेक्टर का पद
सरकार को कमाई देने वाले महकमों की बात ही कुछ और होती है। धरती की अंदरूनी संपदा को संभालने वाले महकमे में लंबे समय से डायरेक्ट का पद एडिशनल चार्ज के भरोसे चल रहा है। अब डायरेक्ट के पद पर फुल फ्लैश नियुक्ति के पीछे कई पेच बताए जा रहे हैं। इस पद पर महकमे के ही एक सीनियर अफसर दावेदारी कर रहे हैं। उनके पक्ष में बड़े-बड़े खान कारोबारी और नेता सिफारिश कर रहे हैं। दूसरा पक्ष इस पद पर किसी आईएएस को नियुक्त करने की पैरवी कर रहा है। महकमे के दावेदार अफसर के पक्ष में जितनी लॉबिंग हाे रही है, उनके विरोधियों ने दस्तावेजी सबूतों के साथ शिकायतें करने में भी कसर नहीं रखी है। इस उधेड़बुन में डायरेक्टर नियुक्ति की फाइल पर फैसला नहीं हो पा रहा। मंत्री की दुखती रग पर हाथ किसने रखी?
सत्ता में पद मिलने के बावजूद भी कई के मन में टीस रह जाती है। अब सबको तो सब कुछ नहीं मिलता। पिछले दिनों एक नेताजी ने मंत्रीजी से उनके विभाग और उनके काम के बारे में यूं ही पूछ लिया। मंत्रीजी ने भलमनसाहत में सब बता दिया, लेकिन नेताजी ने उनकी दुखती रग पर हाथ रख दिया। मंत्रीजी का दर्द यह था कि विभाग तो उनके पास बड़े-बड़े हैं, लेकिन वे केवल दर्शक के रोल में हैं। मतलब जो हो रहा है उसे ऑब्जर्व ही कर रहे हैं। राज्य मंत्रीजी के महकमे के कैबिनेट मंत्री उन तक फाइल ही नहीं भेजते। अब सत्ता मिलकर भी वह केवल सेरिमरेनियल ही हो तो नेता कैसे संतुष्ट हो सकता है? पद के साथ धमक और चलन नहीं हो तो उसका कोई अर्थ नहीं। मंत्री की इस दुखती रग पर हाथ रखकर नेताजी ने एक तीर से कई शिकार कर लिए। सुनी-सुनाई में पिछले सप्ताह भी थे कई किस्से, पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें मंत्री ने खुद ही दिए विभाग बदलने के संकेत:बड़े अफसर का क्यों हुआ मोहभंग, मंत्री ने महिला अफसर को क्यों किया फोन

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