भास्कर न्यूज| राजनांदगांव जैन बगीचे के नए हाल में जारी नियमिति प्रवचन के तहत मुनि विनय कुशल श्रीश्री के शिष्य मुनि वीरभद्र (विराग) श्रीजी ने बुधवार को कहा कि परमात्मा के प्रति हमें पूर्णत: समर्पित होना चाहिए। हम किस कैटेगरी के हैं, यह हमें ही तय करना होगा और साधना का मार्ग अपनाकर समाधि प्राप्त करनी होगी। हमें अपने भीतर वह योग्यता पैदा करनी होगी कि हम लोगों का पथ प्रदर्शक बन सके। कहा कि हमें विवेक से शब्दों का चयन कर बोलना चाहिए। हमारे मुंह से निकला वाक्य नहीं लौट सकता। हम कोई भी नई चीज देखते हैं तो उसके प्रति हमारा आकर्षण बढ़ जाता है और हम उसे और अच्छी तरह से देखना व जानना चाहते हैं। दरअसल यह मनुष्य की जिज्ञासा प्रवृत्ति है जो उस नई चीज के तह तक जाने की इच्छा रखती है। जब तक हम उसके बारे में पूरी तरह जान ना लें, तब तक हमारी जिज्ञासा बनी रहती है। कहा कि हर व्यक्ति दूसरे के कैलकुलेशन में लगा रहता है जबकि खुद का कैलकुलेशन वह करता नहीं है। बेहतर होता कि वह खुद का कैलकुलेशन कर अपने गुण में सुधार लाता। मुनिश्रीजी ने कहा कि चातुर्मास किसके लिए है? हम एक घंटा भी अपनी दुकान से राग नहीं हटा पा रहे हैं। हम जो कुछ कर रहे हैं अपने लिए कर रहे हैं। हम यहां आते हैं तो सर्व मंगल की कामना लिए आते हैं। 1 घंटे का समय राग-द्वेष छोड़कर साधना के लिए दें और आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें। अपने अंदर ऐसी योग्यता पैदा करें कि हम भी कई लोगों के आत्म कल्याण के मार्ग के पथ प्रदर्शक बने। हमें अनंत काल के लिए सुखी रहना है तो अपने अंदर के गुण को सुधारें और समाधि प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करें। व्यक्ति से हमारा आत्मीय लगाव हो जाता है: कहा कि हम किसी के साथ कुछ दिन रहते हैं तो उससे आत्मीयता जुड़ जाती है, जिस तरह हम ट्रेन के एक कंपार्टमेंट में बैठे होते हैं तो सामने वाले व्यक्ति से हमारा आत्मीय लगाव हो जाता है। उसे व्यक्ति का गंतव्य स्टेशन आने पर वह बोगी से उतर जाता है तो इसका मतलब यह नहीं कि हमारी आंखों से आंसू निकले, बल्कि हम यह तो जानते थे कि उसका स्टेशन आ गया है तो वह उतरेगा ही, इसलिए उसे खुशी-खुशी विदा करते हैं। ठीक इसी तरह यह जीव भी है जो एक कंपार्टमेंट में है और स्टेशन आने पर वह कंपार्टमेंट से बाहर चला जाएगा।


